भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१६०मृच्छकटिकम्

माथुरः-- ( अक्षिणी प्रमृज्य द्यूतकरं प्रति ) अरे ! देहि देहि। ( अरे ! देहि देहि। )

**द्यूतकरः--**भट्ठा ! जावदेव अम्हे दद्दुरेण कलहाइदा, तावदेव सो गोहो अवक्कन्तो। ( भर्तः ! यावदेव वयं दर्दुरेण कलहायिताः, तावदेव स पुरुषोऽपक्रान्तः। )

**माथुरः--**तस्स जूढकलस्स मुट्टिप्पहालेण णासिका भग्गा आसि। ता एहि, रुहिरपहं अणुसरेम्ह। ( तस्य द्यूतकरस्य मुष्टिप्रहारेण नासिका भग्ना आसीत्। तदेहि, रुधिरपथमणुसरावः )

( अनुसृत्य )

**द्यूतकरः--**भट्ठा। वसन्तसेणागेहं पविट्ठो सो। ( भर्तः ! वसन्तसेनागेहं प्रविष्टः सः। )


**अर्थ—**जो आदमी अपने सामर्थ्य को समझ कर ( उसके अनुसार ) तौले हुये बोझ को उठाता है वह न तो ( कहीं ) गिरता है और न दुर्गम मार्ग ( या जंगल ) में जाता हुआ मरता है = कष्ट भोगता है ॥ १४ ॥

मैं इस कथन का लक्ष्य = उदाहरण बन गया हूँ।

टीका—यः मनुष्यः = पुरुषः, आत्मबलम् = स्वकीयं सामर्थ्यम्, ज्ञात्वा = विदित्वा, विचिन्त्य वा, तुलितम् = तुलादिना परिमापितं स्वसामर्थ्यानुरूपमिति भावः, भारम् = भारभूतं पदार्थम्, वहति = धारयति, तस्य = जनस्य, स्खलनम् = मार्गे गर्त्तादौ पतनम्, न जायते = न भवति, च = तथा, कान्तारगतः = दुर्गममार्गं गच्छन्, वनं वा गच्छन्, न = नैव, विपद्यते = विनष्टो भवति, म्रियते इति यावत्। अत्राप्रस्तुतप्रशंसालङ्कारः। आर्यावृत्तम् ॥ १४ ॥

**विमर्श—**आत्मबलं ज्ञात्वा—संवाहक का आशय यह है कि जो व्यक्ति अपनी स्थिति को ठीक से न समझ कर भारतुल्य त्रुटियाँ कर डालता है। उसे उनका फल भोगना ही पड़ता है। तुलितम्—उन्मानार्थक √तुल् + क्त। विपद्यते --वि + पद् + श्यन् = य + लट् प्र. पु. ए. व. ॥१४॥

अर्थ—माथुर—( आँखें साफ करके, द्यूतकर से ) अरे ! दे, दे।

**द्यूतकर—**जब तक हम लोग दर्द्दुरक से लड़ रहे थे तब तक वह पुरुष ( संवाहक ) भाग गया।

**माथुर—**घूंसे के प्रहार से उस जुआरी की नाक फूट गयी थी ( अर्थात् खून निकलने लगा था )। इस लिये, चलो, खूनी रास्ते का अनुसरण करें।

( पीछे चलकर )

द्यूतकर— स्वामिन् ! वह वसन्तसेना के घर में घुस गया है।