भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१६४ | मृच्छकटिकम्

**विदूषकः—**ता सुवेह्म । ( तत् स्वपिवः । ) ( नाटयेन स्वपिति । ) ( ततः प्रविशति शर्विलकः । )

शर्विलकः—

कृत्वा शरीर-परिणाह-सुखप्रवेशं शिक्षाबलेन च बलेन च कर्ममार्गम् । माम्, उपसर्पति, इव, चपला, अदृश्यरूपा, या, जरा, इव, मनुष्यसत्त्वम्, परिभूय, वर्द्धते ॥ ८ ॥

**शब्दार्थ—**हि=क्योंकि, इयम्=यह, निद्रा=नींद, ललाटदेशात्=मस्तक से, नयनावलम्बिनी=आंखों पर आती हुई, आंखों पर ठहरने वाली, सती=होती हुई, माम्=मुझ चारुदत्त के, उपसर्पति इव=समीप में आ सी रही है, चपला=चञ्चल, अदृश्यरूपा=न दिखाई देने वाली, या=जो, जरा इव=बुढ़ौती के समान, मनुष्य-सत्त्वम् = आदमी के बल को, परिभूय = तिरस्कृत करके, पराजित करके, वर्द्धते=बढ़ती है ॥८॥

**अर्थ—चारुदत्त—**और क्या ? क्योंकि यह नींद मस्तक से नीचे आंखों पर छा जाने वाली होती हुई मुझ चारुदत्त के पास आ सी रही है। चञ्चल, न दिखाई देने वाली बुढ़ौती के समान जो नींद मनुष्य की शक्ति को अभिभूत करके बढ़ती है। (अर्थात् नींद के सामने किसी की शक्ति नहीं चल पाती है।) ॥ ८ ॥

**टीका—**हि=यतः, इयम्=वर्तमाना, अनुभूयमाना, निद्रा=स्वापः, माम्=चारुदत्तम्, उपसर्पति इव=समीपम् आगच्छति इव, चपला=अस्थिरा, चञ्चला, अतएव अदृश्यरूपा=अप्रत्यक्षरूपा, जरा=वृद्धावस्था, इव=तुल्या, या=निद्रा, मनुष्य-सत्त्वम्=मनुष्याणां बलम्, अभिभूय=तिरस्कृत्य, पराभूय, वर्द्धते=एधते, एवञ्च निद्रायाः विषये न कस्यापि शक्तिः प्रभवति। अतोऽहमसमर्थ इति भावः। अत्र पूर्वार्द्धे उत्प्रेक्षा, उत्तरार्द्धे चोपमा, वंशस्थं वृत्तम् ॥ ८ ॥

**विमर्श—**इसमें निद्रा की अपराजेय शक्ति का वर्णन है। ललाट से नयनों तक नीचे आने की कल्पना के साथ समीपागमन की उत्प्रेक्षा की गई है। अतः पूर्वार्द्ध में 'क्रिया के साथ इव' होने से उत्प्रेक्षा अलंकार है। और उत्तरार्द्ध में सादृश्यार्थक इव होने से उपमा है। दोनों की संसृष्टि है। नयनावलम्बिनी—नयने अवलम्बते—इस विग्रह में णिनि प्रत्यय है। परिभूय —परि + √भू + क्त्वा=ल्यप् ॥ ८ ॥

**अर्थ—विदूषक—**तो हम दोनों सो जायें।

( सोने का अभिनय करता है। )

( इसके बाद शर्विलक प्रवेश करता है। )

**अन्वयः—**शिक्षाबलेन, च, बलेन, च, शरीरपरिणाह-सुखप्रवेशम्, कर्ममार्गम्,