भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 280
तृतीयोऽङ्कः२६३

( निद्रां नाटयन् 'तं तस्य स्वरसंक्रमम्' इत्यादि पुनः पठति । )

विदूषकः—अवि णिद्दाअदि भवं ? ( अपि निद्राति भवान् ? )

चारुदत्तः—अथ किम् ?

इयं हि निद्रा नयनावलम्बिनी ललाटदेशादुपसर्पतीव माम् । अदृश्यरूपा चपला जरेव या मनुष्यसत्त्वं परिभूय वर्द्धते ॥ ८ ॥


अर्थ—इस स्वर्णाभूषणपात्र को भीतर चौशाला में ले जाना व्यर्थ है। चूंकि यह वेश्या की धरोहर है, अतः हे विप्र ! तब तक अपने ही पास रखो जब तक कि उस ( वसन्तसेना ) को वापस नहीं दे दी जाती ॥ ७ ॥

टीका—इमम्=स्वर्णाभूषणसमूहम्, चतुःशालम्=चतस्रः शालाः यस्मिन् तम्, अन्योन्याभिमुखीभूतगृहचतुष्टययुक्तमित्यर्थः, प्रवेश्य = संस्थाप्य, अलम्=व्यर्थम्, प्रतिषेधार्थे क्त्वः ल्यप्, स्थापनं न सुरक्षितमिति भावः, यस्मात्=यस्मात् कारणात्, एषः=आभूषणसमूहः, प्रकाशनांरीधृतः=प्रकाशनांरी=वेश्या, तया धृतः=न्यासरूपेण स्थापितः, तस्मात्=तस्मात् कारणात्, भोः विप्र !=हे ब्राह्मण !, तावत्=तावत्-कालपर्यन्तम्, स्वयम्=स्वसमीपे एव, धारय=स्थापय, सुरक्षित रक्ष, यावत्=यावत्-कालपर्यन्तम्, तस्याः=वसन्तसेनायाः सम्बन्धसामान्ये षष्ठी, 'हस्ते' इति शेषो वा, न=नैव, समर्प्यते=प्रत्यर्प्यते । काव्यलिङ्गमलङ्कारः इन्द्रवज्रोपेन्द्रवज्रयोः सम्मेल-नादुपजातिर्वृत्तम् ॥ ७ ॥

विमर्श—अलं प्रवेश्य—यहाँ 'अलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा ( पा. सू. ३।४।१८) से क्त्वा=ल्यप् प्रत्यय हुआ है। चतुःशालम्—आमने सामने चार भवनों का होना प्राचीन काल में प्रचलित था। अथवा आमने सामने चार कमरों वाला भीतरी मकान। धृतः=रखा हुआ, कुछ ने धारण किया हुआ—यह अर्थ किया है, वह तर्कसंगत नहीं है। तस्याः यहाँ सम्बन्धसामान्य में षष्ठी मानना चाहिये, अथवा 'हस्ते' आदि का अध्याहार कर लेना चाहिये। यहाँ चारुदत्त अपने जीर्ण शीर्ण मकान में स्वर्णाभूषण को रखना सुरक्षित नहीं समझता है। अतः हर समय किसी न किसी को सुरक्षा का उत्तरदायी बनाना चाहता है। यहाँ इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा का योग होने से उपजाति छन्द है ॥ ७ ॥

( निद्रा का अभिनय करता हुआ 'उस रेभिल की वह स्वरयोजना'—इत्यादि को फिर पढ़ता है । )

**अर्थ—विदूषक—**क्या आप सोने लगे हैं ?

अन्वयः—हि, इयम्, निद्रा, ललाटदेशात्, नयनावलम्बिनी, ( सती ),

१३ मृ०