मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः
( ततः प्रविशति चेटी । )
चेटी—आणत्तह्मि अत्ताए अज्जआये सआसं गन्तु । एसा अज्जआ चित्तफलअ-णिसण्ण-दिट्ठी मंदणिआए सह किं पि मन्तअन्ती चिट्ठदि । ता जाव उपसप्पामि । ( इति परिक्रामति ) । ( आज्ञप्तास्मि मात्रा आर्यायाः सकाशं गन्तुम् । एषा आर्या चित्रफलकनिषण्णदृष्टिर्मदनिकया सह किमपि मन्त्रयन्ती तिष्ठति । तद्यादुपसर्पामि । )
( ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टा वसन्तसेना मदनिका च । )
वसन्तसेना—हञ्जे मदणिए ! अवि सुसदिसी इअं चित्ताकिदी अज्ज-चारुदत्तस्स ? ( हञ्जे मदनिके ! अपि सुसदृशी इयं चित्राकृतिः आर्यचारुदत्तस्य ?)
मदनिका—सुसदिसी । ( सुसदृशी । )
वसन्तसेना—कधं तुमं जाणासि ? । ( कथं त्वं जानासि ? )
मदनिका—जेण अज्जआए सुसिणिद्धा दिट्ठी अणुलग्गा । ( येन आर्यायाः सुस्निग्धा दृष्टिरनुलग्ना । )
वसन्तसेना—हञ्जे ! किं वेस-वास-दाक्खिण्णेण मदणिए ! एव्वं भणासि ? । ( हञ्जे ! किं वेशवासदाक्षिण्येन मदनिके ! एवं भणसि ? ) ।
( इसके बाद चेटी प्रवेश करती है । )
अर्थ—चेटी—[ वसन्तसेना की ] माता ने वसन्तसेना के पास जाने की आज्ञा दी है । वह वसन्तसेना चित्रफलक ( तस्वीर ) पर आँख गड़ाये हुये मदनिका के साथ ( कुछ ) बातचीत करती हुई बैठी है । तो अब उनके पास चलती हूँ । ( इस प्रकार कहकर रंगमंच पर घूमती है । )
( इसके बाद उपर्युक्त रीति से बैठी हुई वसन्तसेना और मदनिका प्रवेश करती है । )
वसन्तसेना—चेटि मदनिके ! क्या आर्य चारुदत्त की यह चित्राकृति ( चित्र में बनी हुई आकृति ) मेरी सुन्दर आकृति के योग्य है ?
मदनिका—( हाँ ), यह ( आपके ) अनुरूप ही है ।
वसन्तसेना—तुम कैसे जान रही हो ?
मदनिका—क्योंकि आर्या ( आप ) की स्नेहमयी दृष्टि इस पर लगी हुई है ।
वसन्तसेना—चेटी मदनिके ! क्या वेश्या के घर पर रहने से ( सीखी गई ) चतुरता के कारण ऐसा कह रही हो ?