भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

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तृतीयोऽङ्कः

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वयस्य मैत्रेय ! भवताप्यकृपणशौण्डैर्यमभिधातव्यम् ।
विदूषकः—भो ! दलिद्दो किं अकिवणं मन्तेदि ? ( भोः ! दरिद्रः किम् अकृपणं मन्त्रयति ? )
चारुदत्तः—अदरिद्रोऽस्मि सखे ! ( 'यस्य मम---विभवानुगता भार्या' इत्यादि पुनः पठति ।) तद्गच्छतु भवान् । अहमपि कृतशौचः सन्ध्या-मुपासे ।

इति निष्क्रान्ताः सर्वे ।

इति सन्धिच्छेदो नाम तृतीयोऽङ्कः ।


है कि चारुदत्त ने स्वयं ही चोरी करने के लिये सेंध लगा ली है । इसी प्रकार के अन्य दोष आरोपित किये जा सकते हैं । अतः सेंध को, जितनी जल्दी हो भर देना चाहिये । पूर्वार्द्ध के प्रति हेतुरूप से उत्तरार्द्ध का कथन होने से काव्यलिङ्ग अलंकार है और आर्या छन्द है ॥ ३० ॥

मित्र मैत्रेय ! आप को भी ( वसन्तसेना के साथ ) अत्यन्त उदारता से बात करनी है ।

विदूषक—अरे ! दरिद्र भी क्या उदारता से कह सकता है ?

चारुदत्त—मित्र मैं दरिद्र नहीं हूँ । ( जिस मेरी -धनानुसार निर्वाह करने वाली पत्नी है--इत्यादि को फिर पढ़ाता है ।) तो आप जायें । मैं भी शौच=स्नानादि से निवृत्त होकर ( प्रातःकालिक ) सन्ध्योपासना करता हूँ ।

इस प्रकार सभी निकल जाते हैं ।

॥ इस प्रकार सन्धिच्छेद ( सेंध फोड़ना ) नामक तीसरा अङ्क समाप्त हुआ है ॥

॥ जय-शङ्करलाल-त्रिपाठि-विरचित भावप्रकाशिका-व्याख्या में मृच्छकटिक का तृतीय अङ्क समाप्त हुआ ॥

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