मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ मृच्छकटिकम्
प्रथमा चेटी—( उपसृत्य ) अज्जए ! अत्ता आणवेदि—'गहिदावगुण्ठणं पक्खदुआरए सज्जं पवहणं । ता गेच्छ' त्ति । ( आर्ये ! माता आज्ञापयति— 'गृहीतावगुण्ठनं पक्षद्वारे सज्जं प्रवहणं तद्गच्छ' इति । )
वसन्तसेना—हज्जे ! किं अज्जचारुदत्तो मं णइस्सदि ? । ( हञ्जे ! किम् आर्य-चारुदत्तो मां नेष्यति ? )
चेटी—अज्जए ! जेण पवहणेण सह सुवण्ण-दससाहस्सिओ अलङ्कारओ अणुपैसिदो । ( आर्ये ! येन प्रवहणेन सह सुवर्ण-दशसाहस्रिकोऽलङ्कारः अनुप्रेषितः । )
वसन्तसेना—को उण सो ? ( कः पुनः सः ? )
चेटी—एसो ज्जेव राअस्सालो संठाणओ । ( एष एव राजश्यालः संस्थानकः ) ।
वसन्तसेना—(सक्रोधम्) अवेहि । मा पुणो एव्वं भणिस्ससि । ( अपेहि । मा पुनरेवं भणिष्यसि ।
चेटी—पसीददु पसीसदु अज्जआ । सन्देसेण म्हि पेसिदो । ( प्रसीदतु प्रसीदतु आर्या । सन्देशेनास्मि प्रेषिता ) ।
वसन्तसेना—अहं सन्देसस्य ज्जेव कुप्पामि । ( अहं सन्देशस्यैव कुप्यामि )
चेटी—ता किंत्ति अत्तं विण्णविस्सं । ( तत् किमिति मातरं विज्ञापयिष्यामि ? )
पहली चेटी—( समीप जाकर ) आर्ये ! माता जी यह आज्ञा दे रही हैं— बगलवाले दरवाजे पर ढंकी हुई गाड़ी ( रथ ) सजी हुई खड़ी है, अतः आप ( उससे ) जायें ।
वसन्तसेना—सखि ! क्या आर्य चारुदत्त मुझे ले जायेंगे ?
चेटी—आर्ये ! जिसने गाड़ी के साथ साथ दस हजार सोने के अलंकार [ मोहरें या अशर्फी आदि ] भेजे हैं ।
वसन्तसेना—वह कौन है ?
चेटी—वही राजा का शाला संस्थानक ।
वसन्तसेना—( क्रोध के साथ ) दूर हट जाओ । फिर कभी ऐसा मत कहना ।
चेटी—आर्या, प्रसन्न हो जाँय, प्रसन्न हो जाँय । मैं तो [ माता के ] सन्देश से यहाँ भेजी गयी हूँ ।
वसन्तसेना—मैं भी सन्देश पर ही नाराज हो रही हूँ ।
चेटी—तो माता जी से क्या कहूँगी ?