मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः २५७
शर्विलकः-ततः किम् ?
मदनिका-स च तस्य अज्जस्स हत्थे विणिक्खित्तो। (स च तस्य आर्यस्य हस्ते विनिक्षिप्तः ।)
शविलकः-किमर्थम् ?
मदनिका--( कर्णे ) एव्वं विअ । ( एवमिव । )
शविलकः-( सवैलक्ष्यम् ) भोः ! कष्टम् ।
छायार्थं ग्रीष्मसन्तप्तो यामेवाहं समाश्रितः।
अजानता मया सैव पत्रैः शाखा वियोजिता ॥ १८ ॥
शर्विलक-तो इससे क्या ?
मदनिका-यह उन आर्य ( चारुदत्त ) के हाँथ गिरवीं रखा गया था ।
शर्विलक-किस लिये ?
मदनिका--( कान में ) इस लिये ।
शविलक--( लज्जा के साथ ) हाय ! कष्ट है ।
**अन्वयः-**ग्रीष्मसन्तप्तः, अहम्, छायार्थम्, याम्, एव, समाश्रितः, अजानता, मया, सा, एव, शाखा, पत्रैः, वियोजिता ॥ १८ ॥
**शब्दार्थ-**ग्रीष्मसन्तप्तः=गर्मी=धूप से परेशान, अहम् = मैंने, छायार्थम्=छाया के लिये, याम्=जिस ( शाखा ) का, समाश्रितः=सहारा लिया था; अजानता=न जानते हुये, मया=मैंने, सा=उसी, शाखा=शाखा ( पेड़ की डाल ) को, पत्रैः=पत्तों से, वियोजिता=रहित कर दिया ॥ १८ ॥
**अर्थ-**गर्मी ( की धूप ) के कारण परेशान मैंने छाया ( प्राप्त ) करने के लिये ( वृक्ष की ) जिस शाखा का सहारा लिया था; अज्ञानवश उसे मैंने पत्तों से रहित बना डाला । ( अर्थात् वसन्तसेना से छुड़वाने के लिये कोशिश की परन्तु ये गहने वसन्तसेना के ही हैं अतः अब मदनिका को छुड़वा सकना सम्भव नहीं हैं। यह सब अज्ञानता से हो गया । ) ॥ १८ ॥
**टीका-**मदनिकामुक्त्यर्थमेवमकार्यं कुर्वन् शर्विलकः वसन्तसेनाया एव अनभिलषितं समाचरन् पश्चात्तपति छायार्थमिति। ग्रीष्मसन्तप्तः=निदाघपीडितः, अहम्=शर्विलकः, छायार्थम्=सन्ताप दूरीकरणाम छायाप्राप्त्यर्थम्, यामेव=वृक्षशाखामेव, समाश्रितः=अवलम्बितवान्, अजानता=अनभिज्ञेन, मया=शर्विलकेन, सैव=तादृशी आश्रयीभूता शाखैव, पत्रैः = पल्लवैः, वियोजिता = पत्रशूनीकृता । अत्राप्रस्तुतप्रशंसालङ्कारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ १८ ॥
**विमर्श-**यहाँ शर्विलक अपनी गलती का पश्चात्ताप कर रहा है। यहाँ ग्रीष्मसन्तप्त का छायाप्राप्ति के लिये आश्रित शाखा के पत्तों का उजाड़ना अप्रस्तुत
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