भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२५६ मृच्छकटिकम्

आः, दुरात्मन् चारुदत्तहतक ! अयं न भवसि । ( इति कतिचित् पदानि गच्छति )

मदनिका-- ( अञ्चले गृहीत्ता ) अइ अम्बद्धभासअ ! असम्भावणीए कुप्पसि । ( अयि असम्बद्धभाषक ! असम्भावनीये कुप्यसि । )

शर्विलकः--कथमसम्भावनीयं नाम ! ।

मदनिका--एसो क्खु अलङ्कारओ अज्जआकेरओ ( एष खल्वलङ्कारः आर्य्यासम्बन्धी । )


होते हैं; तथा = इसी प्रकार, वेशजाताः = वेश्या के घर में उत्पन्न होने वाली; अङ्गनाः=स्त्रियाँ, शुचयः=पवित्र, न=नहीं, भवन्ति=होती हैं ॥ १७ ॥

अर्थ-- किसी का समुचित कथन है--

कमलिनी पहाड़ की चोटी पर नहीं पैदा होती है । गधे घोड़े के बोझे को नहीं ढोते हैं । ( खेत आदि में ) छींटे गये, बिखेरे गये जौ धान नहीं बन जाते हैं । उसी प्रकार वेश्यागृह में उत्पन्न स्त्रियाँ पवित्र नहीं होती हैं ॥ १७ ॥

टीका-- वेश्यानां निरतिशयनीचतां प्रकटयितुं शिष्टोक्तिमुदाहरति--नेति । नलिनी=पद्मिनी, पर्वताग्रे = गिरिशिखरे, न=नैव, प्ररोहति=जायते; गर्दभाः=रासभाः, बाजिधुरम्=अश्ववाह्यं भारम्, न=नैव, वहन्ति=धारयन्ति; प्रकीर्णाः=उप्ताः, यवाः=एतन्नाम्ना प्रसिद्धा धान्यविशेषाः, शालयः=तन्नाम्ना प्रसिद्धाः धान्य-विशेषाः, न=नैव, भवन्ति=जायन्ते; तथा=तेनैव प्रकारेण, वेशजाताः=वेश्याजनाश्रये उत्पन्नाः, = स्त्रियः, वेश्या इति भावः, शुचयः=पवित्राचरणाः, न=नैव, भवन्ति । अत्र द्वितीयपादे एकाक्षरन्यूनत्वात् हतवृत्तता दोषः, वंशस्थबिलं वृत्तम् । दृष्टान्ता-लङ्कारः ॥ १७ ॥

विमर्श-- यहाँ तीन के असम्भवत्व के समान वेश्याजनों की पवित्रता का असम्भवत्व प्रतिपादित किया गया है । द्वितीय से चतुर्थपाद तक कर्ता बहुवचन है परन्तु प्रथमपाद में एकवचन है । अतः भग्नप्रक्रमता दोष है । यहाँ दृष्टान्त अलङ्कार फलित होता है । इसमें वंशस्थ छन्द है । परन्तु द्वितीयपाद में एक अक्षर न्यून होने के कारण हतवृत्तता दोष है ॥ १७ ॥

अर्थ-- अरे नीच चारुदत्त ! यह तुम ( अब जीवित ) नहीं हो । ( अर्थात् मैं अभी तुम्हें मार डालता हूँ ! ) ( यह कह कर कुछ कदम चलता है । )

मदनिका-- ( आँचल में पकड़ कर ) अरे ऊटपटांग बोलने वाले ! असम्भाव-नीय ( जिसकी सम्भावना नहीं की जा सकती उस ) पर क्रोध कर रहे हो ।

शर्विलक-- असम्भावनीय कैसे ?

मदनिका-- यह अलङ्कार आर्या ( वसन्तसेना ) का है ।