मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः २५५
सूक्तं खलु कस्यापि---
न पर्वताग्रे नलिनी प्ररोहति न गर्दभा वाजिधुरं वहन्ति। यवाः प्रकीर्णा न भवन्ति शालयो न वेशजाताः शुचयस्तथाऽङ्गना ॥१७॥
शब्दार्थ---( स्त्रियः=वेश्यायें ), हृदयेन=हृदय से, मन से, अन्यम्=दूसरे, मनुष्यम्=मनुष्य को, कृत्वा=चाह कर या स्थापित करके, ततः=उसके बाद, अन्यम्=किसी दूसरे व्यक्ति को, दृष्टिभिः=आंखों के ( संकेतों ) से, आह्वयन्ति=बुलाती हैं; अन्यत्र=किसी अन्य पुरुष में, मदप्रसेकम्=अपने यौवन मद के हाव भावादि को, मुञ्चन्ति=छोड़ती हैं; च=और शरीरेण=शरीर द्वारा, अन्यम्=किसी दूसरे को, कामयन्ते=चाहती हैं ।। १६ ।।
**अर्थ---**अत्यन्त चञ्चल वेश्या स्त्रियाँ-- हृदय में किसी दूसरे को रख कर उससे भिन्न पुरुष को आँख के संकेतों से बुलाती हैं । किसी अन्य पुरुष के विषय में ( अपने यौवन ), मद के हाव भाव छोड़ती हैं या मदिरा का कुल्ला करती हैं । और किसी अन्य को शरीर से चाहती हैं ।। १६ ।।
**टीका---**वेश्यात्वमेव निन्दन्नाह--अन्यमिति। अत्र सर्वत्र गद्यस्थेन 'स्त्रिय' इति कर्तृपदेनान्वयः । हृदयेन = मनसा, अन्यम्=एकम्, जनम्=पुरुषम् कृत्वा=निश्चित्य, संस्थाप्य वा, एकस्मिन् मनुष्ये मनः आधाय इति यावत् ; ततः=तस्मात् जनात्, अन्यम्=भिन्नम्, दृष्टिभिः=कटाक्षैः, आह्वयन्ति=सङ्केतयन्ति; अन्यत्र=तस्मात् अपरस्मिन् जने, मदप्रसेकम् = यौवनजनितसाहङ्कारव्यवहारम् अथवा मदस्य=सुरागण्डूषस्य, प्रसेकम्=मुखात् क्षेपम्, मुञ्चन्ति=त्यजन्ति । शरीरेण=देहेन, च, अन्यम्=ततो भिन्नम्, कामयन्ते=अभिलषन्ति । अत्र दीपकालङ्कारः, इन्द्रवज्रा वृत्तम् ।। १६ ।।
विमर्श- इस श्लोक के चारो पादों में 'अन्य' शब्द के प्रयोग के कारण अनवीकृतत्व दोष है । एक स्त्रीरूप कर्तृपद का स्थापन, आह्वान, परित्याग एवं कामना रूपी क्रियाओं के साथ अन्वय होने से दीपक अलङ्कार है । ततः अन्यम्-यहाँ पृथक् अर्थ मान कर पञ्चमी में तसिल् प्रत्यय मानना चाहिये ।। १६ ।।
**अन्वय---**नलिनी, पर्वताग्रे, न, प्ररोहति, गर्दभाः, वाजिधुरम्, न, वहन्ति; प्रकीर्णाः, यवाः, शालयः, न, भवन्ति; तथा, वेशजाताः अङ्गनाः, शुचयः, न भवन्ति ॥ १७ ॥
**शब्दार्थ---**नलिनी = कमलिनी, पर्वताग्रे = पहाड़ की चोटी पर, न=नहीं, प्ररोहति=पैदा होती है; गर्दभाः=गधे, वाजिधुरम्=घोड़े के बोझे को, न=नहीं, वहन्ति=ढोते हैं; प्रकीर्णाः=बिखेरे गये, यवा=जौं, शालयः=धान, न=नहीं, भवन्ति=