मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ | मृच्छकटिकम्
स्त्रियो नाम चपलाः—
अन्यं मनुष्यं हृदयेन कृत्वा ह्यन्यं ततो दृष्टिभिराह्वयन्ति ।
अन्यत्र मुञ्चन्ति मदप्रसेकमन्यं शरीरेण च कामयन्ते ॥ १६ ॥
शब्दार्थ—समुद्रवीची इव = सागर की तरङ्ग के समान, चलस्वभावाः = चञ्चलस्वभाव वाली; सन्ध्याभ्रलेखा इव = सायंकालीन मेघों की पंक्ति के समान, मुहूर्तरागाः = क्षणिक अनुराग करने वालीं, स्त्रियः = औरतें ( = वेश्यायें ), हृतार्थाः = सारा धन हरण कर लेने वाली, [ सत्यः = होती हुई ], निरर्थम् = धनहीन, पुरुषम् = पुरुष को, निष्पीडितालक्तकवत् = निचोड़े गये आलता = महावर के समान, त्यजन्ति = छोड़ देती हैं, फेंक देती हैं ॥ १५ ॥
अर्थ—और भी—
सागर की तरङ्गों के समान चञ्चल स्वभाववाली, सायंकालीन मेघों की पंक्ति के समान क्षण भर के लिये रागवाली (मेघ पक्ष में राग = लालिमा, से युक्त, वेश्यापक्ष में राग = अनुराग से युक्त), स्त्रियाँ (वेश्यायें) सारा धन हरण कर लेने के बाद धनहीन पुरुष को निचोड़े गये आलता (महावरं) के समान छोड़ देती हैं, फेंक देती हैं ॥ १५ ॥
टीका—पुनः वेश्याभावमेव निन्दन्नाह—समुद्रवीचीति । समुद्रवीचीव = सागरतरङ्ग इव, चलः = चञ्चलः, स्वभावः = प्रकृतिर्यासां ताः, अतिचपला इत्यर्थः, **सन्ध्याऽभ्रलेखा—**सन्ध्यायाम् = सायंकाले यद् अभ्रम् = अस्तगमनोन्मुखसूर्यकिरण-रञ्जितो मेघः, तस्य, लेखा = रेखा, इव = यथा, मुहूर्तम् = अत्यल्पकालम्, रागः = अनुरागः, मेघपक्षे—रक्तिमा, यासां ताः, स्त्रियः = वेश्याः, हृतः = वञ्चितः, पुरुषात् गृहीतः, अर्थः = धनं याभिः तथाभूताः, सत्यः, निरर्थम् = धनहीनम्, पुरुषम्, निष्पीडितम् = निःसारितम्, यद् अलक्तकम् = लाक्षारसः, तद्वत्, त्यजन्ति = परित्यजन्ति ॥ उपमाऽलङ्कारः उपजातिः वृत्तम् ॥ १५ ॥
**विमर्श—**इसमें स्त्रीजाति का समुद्रवीची एवम् अभ्रलेखा के साथ सादृश्य होने से मालोपमा है। अलक्तकवत्—इसमें तद्धितगत श्रौती उपमा है। रुई में आलता (महावर) भरा रहता है। उसे पानी में भिगा कर स्त्रियाँ पैरों में लगाती हैं। जब तक लगाने लायक होता है लगाती रहती हैं। पूरी तरह निचोड़ने के बाद फेंक देती हैं। उसी प्रकार वेश्यायें भी मनुष्य का सर्वथा शोषण करके छोड़ देती हैं ॥ १५ ॥
अन्वयः—(स्त्रियः ), हृदयेन, अन्यम्, मनुष्यम्, कृत्वा, ततः, अन्यम्, दृष्टिभिः, आह्वयन्ति, अन्यत्र, मदप्रसेकम्, मुञ्चति, अन्यम्, च, शरीरेण, कामयन्ते ॥ १६ ॥