भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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चतुर्थोऽङ्कः २५३

अपि च—

समुद्रवीचीव चलस्वभावाः सन्ध्याभ्रलेखेव मुहूर्त्तंरागाः
स्त्रियो हतार्थाः पुरुषं निरर्थं निष्पीडितालक्तकवत् त्यजन्ति ॥ १५ ॥

तु, न, विश्वसन्ति, तस्मात्, कुलशीलसमन्वितेन, नरेण, श्मशानसुमनाः, इव, वेश्याः, वर्जनीयाः ॥ १४ ॥

शब्दार्थ— एताः = ये (वेश्या में), वित्तहेतोः = धन प्राप्त करने के लिये, हसन्ति=हसती हैं। च=और, रुदन्ति=रोती हैं; पुरुषम्=पुरुष को, विश्वासयन्ति=विश्वास दिलाती हैं; तु=किन्तु, स्वयम् = स्वयम्, न=नहीं, विश्वसन्ति=विश्वास करती है; तस्मात्=इसलिये, कुलशीलसमन्वितेन=उच्च कुल एवं स्वभाव से युक्त, नरेण=पुरुष को, वेश्याः=वेश्यायें, श्मशानसुमनाः=श्मशानस्थल पर लगने वाले फूल के, इव=समान, वर्जनीयाः=छोड़ देनी चाहिये। (उनसे किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये।) ॥ १४ ॥

अर्थ— वस्तुतः यह उचित ही कहा जाता है—
ये (वेश्यायें) धन कमाने के लिये (प्रेमी के प्रति) हसती हैं और रोती हैं। पुरुष को (अपने ऊपर) विश्वास दिलाती है परन्तु (स्वयं पुरुषों पर) विश्वास नहीं करती हैं। अतः उत्तम कुल एवं स्वभाव वाले पुरुष को वेश्याओं का परित्याग श्मशानस्थल पर लगे हुये फूलों के समान कर देना चाहिये ॥ १४ ॥

टीका— स्त्रीसामान्यं विनिन्द्य पुनः स्त्रीविशेषां वेश्यां निन्दति—एता इति। एताः=वारनार्यः, वेश्याः, वित्तहेतोः=धनस्य कारणात्, अनुरागिपुरुषं प्रति, हसन्ति=हासं कुर्वन्ति, रुदन्ति=विलपन्ति, कदाचित् हासप्रदर्शनं कदाचिच्च अश्रु प्रदर्शनं कृत्वा विमोहयन्तीति भावः, पुरुषम्=अनुरागिणं जनम् विश्वासयन्ति=प्रत्याययन्ति, च, तु=किन्तु स्वयम्, न=नैव, विश्वसन्ति = प्रतियन्ति, विश्वासं कुर्वन्तीत्यर्थः, तस्मात्=पूर्वोक्तहेतोः, कुलेन = सद्वंशेन, स्वभावेन = उत्तमप्रकृत्या च समन्वितेन=युक्तेन, नरेण=पुरुषेण, वेश्याः=वारनार्यः, श्मशाने=श्मशानक्षेत्रे उत्पन्नाः, सुमनाः=पुष्पम् इव=तुल्याः, वर्जनीया=परिहातव्याः, यत्र दीपकमुपमा चालङ्कारः, वसन्त-तिलकं वृत्तम् ॥ १४ ॥

विमर्शः— वेश्याओं के सारे क्रियाकलाप धन=प्राप्ति के लिये ही होते हैं। अतः इनके हसने या रोने के चक्कर में नहीं फँसना चाहिये। यहाँ 'एताः' एक ही कर्ता (कर्त्री) का हास, रुदन, विश्वासोत्पादन आदि अनेक क्रियाओं के साथ सम्बन्ध होने से दीपक अलंकार है। उत्तरार्ध में, श्मशानपुष्पों के साथ वेश्याओं का परित्याग बताया गया है। अतः उपमा भी है। वसन्ततिलका छन्द है ॥ १४ ॥

अन्वयः— समुद्रवीची, इव, चलस्वभावाः, सन्ध्याभ्रलेखा, इव, मुहूर्त्तरागाः, स्त्रियः, हतार्थाः, (सत्यः), निरर्थम्, पुरुषम्, निष्पीडितालक्तकवत्, त्यजन्ति ॥१५॥