भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२५२ मृच्छकटिकम्

स्त्रीषु न रागः कार्यो रक्तं पुरुषं स्त्रियः परिभवन्ति ।
रक्तैव हि रन्तव्या विरक्तभावा तु हातव्या ॥ १३ ॥

सुष्ठु खल्विदमुच्यते—

एता हसन्ति च रुदन्ति च वित्तहेतो-
विश्वासयन्ति पुरुषं न तु विश्वसन्ति ।
तस्मान्नरेण कुलशीलसमन्वितेन
वेश्याः श्मशानसुमना इव वर्जनीयाः ॥ १४ ॥


दीपक है । भुजंगकन्यानामिव—यहाँ उपमा भी है । परस्पर अङ्गाङ्गिभाव से सङ्कर है । उपेन्द्रवज्रा और इन्द्रवज्रा के योग से उपजाति छन्द है ॥ १२ ॥

अन्वयः—स्त्रीषु, रागः, न, कार्यः, (यतः), स्त्रियः, रक्तम्, पुरुषम्, परभवन्ति, हि, रक्ता, एव, रन्तव्या, विरक्तभावा, तु, हातव्या ॥ १३ ॥

शब्दार्थ—स्त्रीषु = स्त्रियों पर, रागः=प्रेम, न=नहीं, कार्यः=करना चाहिये, (यतः=क्योंकि) स्त्रियः=स्त्रियाँ, रक्तम्=अनुरक्त, प्रेमी, पुरुषम्=पुरुष को; परिभवन्ति=अपमानित कर देती है, हि=अतः, रक्ता=(अपने प्रति) अनुरक्त, एव=ही, रन्तव्या=रमण=प्रेम योग्य होती है, विरक्तभावा=न चाहनेवाली, उदासीन को, तु=तो, हातव्या=छोड़ देना चाहिये ॥ १३ ॥

अर्थ—स्त्रियों पर (अनपेक्षित) अनुराग नहीं करना चाहिये, क्योंकि स्त्रियाँ अनुरागी (प्रेमी) पुरुष को अपमानित कर देती हैं। (अपने प्रति) अनुराग रखनेवाली के साथ ही रमण (प्रेम) करना चाहिये, न चाहनेवाली को छोड़ देना चाहिये, उससे प्रेम नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥

टीका—पुनः स्त्रीसामान्यविषयिणीं निन्दां करोति-स्त्रीष्विति । स्त्रीषु=नारीषु, रागः=अनपेक्षितोऽनुरागः, न=नैव, कार्यः=विधेयः, (हि=यतः), स्त्रियः=नार्यः, रक्तम्=स्वस्यां परमानुरागिणम्, पुरुषम्=नरम्, परिभवन्ति=अपमानयन्ति, वञ्चयन्तीति यावत्; हि=अतः, रक्ता=आत्मनि अनुरागवती, एव, रन्तव्या=रमणार्या, विरक्तभावा-विरक्तः=अनुरागरहितः, भावः=चित्तम्, यस्याः, तादृशानुरागशून्येति भावः, हातव्या=परिवर्जनीया । काव्यलिङ्गमलङ्कारः, आर्या वृत्तम् ॥ १३ ॥

विमर्श—यहाँ अनुरागवती के साथ ही अनुराग करने का औचित्य प्रस्तुत किया है। यहाँ 'रक्ता एव' यह एवकार अन्ययोगव्यवच्छेद करा ही देता है, अर्थात् रक्ता से भिन्न के साथ रमण=अनुराग नहीं करना चाहिये—यह अर्थ प्रतीत हो जाता है। पुनः 'विरक्तभावा तु हातव्या' इस कथन से पुनरुक्तता दोष है। इसके लिये 'सुरक्ता हि रन्तव्या' ऐसा पाठ परिवर्तन कर लेना चाहिये—ऐसा जीवानन्दविद्यासागर का परामर्श है ॥१३॥

अन्वयः—एताः, वित्तहेतोः, हसन्ति, च, रुदन्ति, च, पुरुषम्, विश्वासयन्ति,