मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
चतुर्थोऽङ्कः २५५
सूक्तं खलु कस्यापि---
न पर्वताग्रे नलिनी प्ररोहति न गर्दभा वाजिधुरं वहन्ति। यवाः प्रकीर्णा न भवन्ति शालयो न वेशजाताः शुचयस्तथाऽङ्गना ॥१७॥
शब्दार्थ---( स्त्रियः=वेश्यायें ), हृदयेन=हृदय से, मन से, अन्यम्=दूसरे, मनुष्यम्=मनुष्य को, कृत्वा=चाह कर या स्थापित करके, ततः=उसके बाद, अन्यम्=किसी दूसरे व्यक्ति को, दृष्टिभिः=आंखों के ( संकेतों ) से, आह्वयन्ति=बुलाती हैं; अन्यत्र=किसी अन्य पुरुष में, मदप्रसेकम्=अपने यौवन मद के हाव भावादि को, मुञ्चन्ति=छोड़ती हैं; च=और शरीरेण=शरीर द्वारा, अन्यम्=किसी दूसरे को, कामयन्ते=चाहती हैं ।। १६ ।।
**अर्थ---**अत्यन्त चञ्चल वेश्या स्त्रियाँ-- हृदय में किसी दूसरे को रख कर उससे भिन्न पुरुष को आँख के संकेतों से बुलाती हैं । किसी अन्य पुरुष के विषय में ( अपने यौवन ), मद के हाव भाव छोड़ती हैं या मदिरा का कुल्ला करती हैं । और किसी अन्य को शरीर से चाहती हैं ।। १६ ।।
**टीका---**वेश्यात्वमेव निन्दन्नाह--अन्यमिति। अत्र सर्वत्र गद्यस्थेन 'स्त्रिय' इति कर्तृपदेनान्वयः । हृदयेन = मनसा, अन्यम्=एकम्, जनम्=पुरुषम् कृत्वा=निश्चित्य, संस्थाप्य वा, एकस्मिन् मनुष्ये मनः आधाय इति यावत् ; ततः=तस्मात् जनात्, अन्यम्=भिन्नम्, दृष्टिभिः=कटाक्षैः, आह्वयन्ति=सङ्केतयन्ति; अन्यत्र=तस्मात् अपरस्मिन् जने, मदप्रसेकम् = यौवनजनितसाहङ्कारव्यवहारम् अथवा मदस्य=सुरागण्डूषस्य, प्रसेकम्=मुखात् क्षेपम्, मुञ्चन्ति=त्यजन्ति । शरीरेण=देहेन, च, अन्यम्=ततो भिन्नम्, कामयन्ते=अभिलषन्ति । अत्र दीपकालङ्कारः, इन्द्रवज्रा वृत्तम् ।। १६ ।।
विमर्श- इस श्लोक के चारो पादों में 'अन्य' शब्द के प्रयोग के कारण अनवीकृतत्व दोष है । एक स्त्रीरूप कर्तृपद का स्थापन, आह्वान, परित्याग एवं कामना रूपी क्रियाओं के साथ अन्वय होने से दीपक अलङ्कार है । ततः अन्यम्-यहाँ पृथक् अर्थ मान कर पञ्चमी में तसिल् प्रत्यय मानना चाहिये ।। १६ ।।
**अन्वय---**नलिनी, पर्वताग्रे, न, प्ररोहति, गर्दभाः, वाजिधुरम्, न, वहन्ति; प्रकीर्णाः, यवाः, शालयः, न, भवन्ति; तथा, वेशजाताः अङ्गनाः, शुचयः, न भवन्ति ॥ १७ ॥
**शब्दार्थ---**नलिनी = कमलिनी, पर्वताग्रे = पहाड़ की चोटी पर, न=नहीं, प्ररोहति=पैदा होती है; गर्दभाः=गधे, वाजिधुरम्=घोड़े के बोझे को, न=नहीं, वहन्ति=ढोते हैं; प्रकीर्णाः=बिखेरे गये, यवा=जौं, शालयः=धान, न=नहीं, भवन्ति=
२५६ मृच्छकटिकम्
आः, दुरात्मन् चारुदत्तहतक ! अयं न भवसि । ( इति कतिचित् पदानि गच्छति )
मदनिका-- ( अञ्चले गृहीत्ता ) अइ अम्बद्धभासअ ! असम्भावणीए कुप्पसि । ( अयि असम्बद्धभाषक ! असम्भावनीये कुप्यसि । )
शर्विलकः--कथमसम्भावनीयं नाम ! ।
मदनिका--एसो क्खु अलङ्कारओ अज्जआकेरओ ( एष खल्वलङ्कारः आर्य्यासम्बन्धी । )
होते हैं; तथा = इसी प्रकार, वेशजाताः = वेश्या के घर में उत्पन्न होने वाली; अङ्गनाः=स्त्रियाँ, शुचयः=पवित्र, न=नहीं, भवन्ति=होती हैं ॥ १७ ॥
अर्थ-- किसी का समुचित कथन है--
कमलिनी पहाड़ की चोटी पर नहीं पैदा होती है । गधे घोड़े के बोझे को नहीं ढोते हैं । ( खेत आदि में ) छींटे गये, बिखेरे गये जौ धान नहीं बन जाते हैं । उसी प्रकार वेश्यागृह में उत्पन्न स्त्रियाँ पवित्र नहीं होती हैं ॥ १७ ॥
टीका-- वेश्यानां निरतिशयनीचतां प्रकटयितुं शिष्टोक्तिमुदाहरति--नेति । नलिनी=पद्मिनी, पर्वताग्रे = गिरिशिखरे, न=नैव, प्ररोहति=जायते; गर्दभाः=रासभाः, बाजिधुरम्=अश्ववाह्यं भारम्, न=नैव, वहन्ति=धारयन्ति; प्रकीर्णाः=उप्ताः, यवाः=एतन्नाम्ना प्रसिद्धा धान्यविशेषाः, शालयः=तन्नाम्ना प्रसिद्धाः धान्य-विशेषाः, न=नैव, भवन्ति=जायन्ते; तथा=तेनैव प्रकारेण, वेशजाताः=वेश्याजनाश्रये उत्पन्नाः, = स्त्रियः, वेश्या इति भावः, शुचयः=पवित्राचरणाः, न=नैव, भवन्ति । अत्र द्वितीयपादे एकाक्षरन्यूनत्वात् हतवृत्तता दोषः, वंशस्थबिलं वृत्तम् । दृष्टान्ता-लङ्कारः ॥ १७ ॥
विमर्श-- यहाँ तीन के असम्भवत्व के समान वेश्याजनों की पवित्रता का असम्भवत्व प्रतिपादित किया गया है । द्वितीय से चतुर्थपाद तक कर्ता बहुवचन है परन्तु प्रथमपाद में एकवचन है । अतः भग्नप्रक्रमता दोष है । यहाँ दृष्टान्त अलङ्कार फलित होता है । इसमें वंशस्थ छन्द है । परन्तु द्वितीयपाद में एक अक्षर न्यून होने के कारण हतवृत्तता दोष है ॥ १७ ॥
अर्थ-- अरे नीच चारुदत्त ! यह तुम ( अब जीवित ) नहीं हो । ( अर्थात् मैं अभी तुम्हें मार डालता हूँ ! ) ( यह कह कर कुछ कदम चलता है । )
मदनिका-- ( आँचल में पकड़ कर ) अरे ऊटपटांग बोलने वाले ! असम्भाव-नीय ( जिसकी सम्भावना नहीं की जा सकती उस ) पर क्रोध कर रहे हो ।
शर्विलक-- असम्भावनीय कैसे ?
मदनिका-- यह अलङ्कार आर्या ( वसन्तसेना ) का है ।
चतुर्थोऽङ्कः २५७
शर्विलकः-ततः किम् ?
मदनिका-स च तस्य अज्जस्स हत्थे विणिक्खित्तो। (स च तस्य आर्यस्य हस्ते विनिक्षिप्तः ।)
शविलकः-किमर्थम् ?
मदनिका--( कर्णे ) एव्वं विअ । ( एवमिव । )
शविलकः-( सवैलक्ष्यम् ) भोः ! कष्टम् ।
छायार्थं ग्रीष्मसन्तप्तो यामेवाहं समाश्रितः।
अजानता मया सैव पत्रैः शाखा वियोजिता ॥ १८ ॥
शर्विलक-तो इससे क्या ?
मदनिका-यह उन आर्य ( चारुदत्त ) के हाँथ गिरवीं रखा गया था ।
शर्विलक-किस लिये ?
मदनिका--( कान में ) इस लिये ।
शविलक--( लज्जा के साथ ) हाय ! कष्ट है ।
**अन्वयः-**ग्रीष्मसन्तप्तः, अहम्, छायार्थम्, याम्, एव, समाश्रितः, अजानता, मया, सा, एव, शाखा, पत्रैः, वियोजिता ॥ १८ ॥
**शब्दार्थ-**ग्रीष्मसन्तप्तः=गर्मी=धूप से परेशान, अहम् = मैंने, छायार्थम्=छाया के लिये, याम्=जिस ( शाखा ) का, समाश्रितः=सहारा लिया था; अजानता=न जानते हुये, मया=मैंने, सा=उसी, शाखा=शाखा ( पेड़ की डाल ) को, पत्रैः=पत्तों से, वियोजिता=रहित कर दिया ॥ १८ ॥
**अर्थ-**गर्मी ( की धूप ) के कारण परेशान मैंने छाया ( प्राप्त ) करने के लिये ( वृक्ष की ) जिस शाखा का सहारा लिया था; अज्ञानवश उसे मैंने पत्तों से रहित बना डाला । ( अर्थात् वसन्तसेना से छुड़वाने के लिये कोशिश की परन्तु ये गहने वसन्तसेना के ही हैं अतः अब मदनिका को छुड़वा सकना सम्भव नहीं हैं। यह सब अज्ञानता से हो गया । ) ॥ १८ ॥
**टीका-**मदनिकामुक्त्यर्थमेवमकार्यं कुर्वन् शर्विलकः वसन्तसेनाया एव अनभिलषितं समाचरन् पश्चात्तपति छायार्थमिति। ग्रीष्मसन्तप्तः=निदाघपीडितः, अहम्=शर्विलकः, छायार्थम्=सन्ताप दूरीकरणाम छायाप्राप्त्यर्थम्, यामेव=वृक्षशाखामेव, समाश्रितः=अवलम्बितवान्, अजानता=अनभिज्ञेन, मया=शर्विलकेन, सैव=तादृशी आश्रयीभूता शाखैव, पत्रैः = पल्लवैः, वियोजिता = पत्रशूनीकृता । अत्राप्रस्तुतप्रशंसालङ्कारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ १८ ॥
**विमर्श-**यहाँ शर्विलक अपनी गलती का पश्चात्ताप कर रहा है। यहाँ ग्रीष्मसन्तप्त का छायाप्राप्ति के लिये आश्रित शाखा के पत्तों का उजाड़ना अप्रस्तुत
१७ मृ०
२५८ मृच्छकटिकम्
बसन्तसेना—कधं एसो वि सन्तप्पदि ज्जेव। ता अजाणन्तेण एदिणा एव्वं अणुचिट्ठिदं। (कथमेषोऽपि सन्तप्यते एव। तदजानता एतेन एवमनुष्ठितम्।)
शर्विलकः—मदनिके ! किमिदानीं युक्तम् ?
मदनिका—इत्थं तुमं ज्जेव पण्डिओ। ( अत्र त्वमेव पण्डितः । )
शर्विलकः—नैवम्। पश्य—
स्त्रियो हि नाम खल्वेता निसर्गादेव पण्डिताः।
पुरुषाणान्तु पाण्डित्यं शास्त्रैरेवोपदिष्यते ॥ १९ ॥
है, इसके द्वारा कामाग्नि से सन्तप्त शर्विलक का मदनिकाप्राप्ति के लिये आश्रित वसन्तसेना के धरोहर के गहनों का चुरा लेना—इस प्रस्तुत का ज्ञान होने से अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार है। इसके माध्यम से मदनिका को न पा सकना द्योतित कर रहा है। पथ्यावक्त्र छन्द है ॥ १८ ॥
**अर्थ—वसन्तसेना—**क्या, यह भी दुःखी हो रहा है ? तो निश्चित ही इसने अनजान में चोरी की है।
**शर्विलकः—**अब क्या करना ठीक होगा ?
**मदनिका—**इस विषय में तो तुम्हीं चतुर हो।
**शर्विलक—**ऐसा नहीं। देखो—
**अन्वयः—**एताः, स्त्रियः, हि, निसर्गात्, एव, पण्डिताः, खलु, नाम, तु, पुरुषाणाम्, पाण्डित्यम्, शास्त्रैः, एव, उपदिश्यते ॥ १९ ॥
**शब्दार्थ—**एताः=ये, स्त्रियः=स्त्रियाँ, हि=निश्चय ही, निसर्गात्=प्रकृति से, एव=ही, पण्डिताः=चतुर, ( होती हैं ), खलु नाम=ऐसा माना जाता है। तु=किन्तु, पुरुषाणाम् = मनुष्यों का, पाण्डित्यम्=चातुर्य, शास्त्रैः=शास्त्रों के द्वारा, एव=ही उपदिश्यते=उपदिष्ट होता है, सिखाया जाता है ॥ १९ ॥
**अर्थ—**ये स्त्रियाँ जन्म से ही अथवा स्वभाव से ही चतुर होती हैं। किन्तु पुरुषों की चतुरता तो शास्त्रों के द्वारा ही सिखाई जाती है । ( अर्थात् स्त्रियां बिना सिखाये ही चतुर होती हैं परन्तु पुरुष सिखाये जाने के बाद ही चतुर हो पाते हैं ) ॥ १९ ॥
**टीका—**उपस्थितसमस्यायां मदनिकाया एवोपायनिर्धारकत्वं व्यवस्थापयितु स्त्रीबुद्धेर्निसर्गसूक्ष्मत्वमाह—स्त्रिः इति। एताः=इमाः, स्त्रियः=नार्यः, निसर्गात्=स्वभावात्, जन्मतओ वा, एव, पण्डिताः = चतुराः, खलु नाम = सम्भावनायाम्, ताः पण्डिता इति सम्भावयामि, तु = परन्तु, पुरुषाणाम् = मनुष्याणाम्, पाण्डित्यम्=चातुर्यम्, शास्त्रैः=शास्त्रदर्शनैः, एव, उपदिश्यते=शिक्ष्यते, कथ्यते वा विद्वद्भिरिति शेषः। एवञ्च अत्र मदनिकाया एव निर्धारकत्वक्षमत्वमिति बोध्यम् ॥ १९ ॥
चतुर्थोऽङ्कः २५६
मदनिका--सव्विलअ ! जइ मम वअणं सुणोअदि, ता तस्य ज्जेव महा-
णुभावस्स पडिणिज्जादेहि। (शर्विलक ! यदि मम वचनं श्रूयते, तत् तस्यैव
महानुभावस्य प्रतिनिर्यातय ।)
शर्विलकः--मदनिके ! यद्यसौ राजकुले मां कथयति ?
मदनिका--ण चन्दादो आदवो होदि । ( न चन्द्रादातपो भवति । )
वसन्तसेना--साहु, मदणिए ! साहु । ( साधु, मदनिके ! साधु । )
शर्विलकः--मदनिके !
न खलु मम विषादः साहसेऽस्मिन् भयं वा
कथयसि हि किमर्थं तस्य साधोगु णांस्त्वम् ।
जनयति मम चेदं कुत्सितं कर्म लज्जां
नृपतिरिह शठानां मादृशां किं नु कुर्यात् ? ॥ २० ॥
विमर्श--पुरुष एवं स्त्री की चतुरता के बारे में यहाँ सुन्दर चित्रण किया गया है। यहाँ स्त्रीजाति के उत्कर्ष का कथन होने से व्यतिरेक अलङ्कार है। पथ्यावक्र छन्द है ॥ १९ ॥
मदनिका—हे शर्विलक ! यदि मेरी बात सुनते हो (मानते हो) तो उन्हीं महानुभाव (चारुदत्त) को वापस दे आओ।
शर्विलक--मदनिके ! यदि ये (चारुदत्त) न्यायालय में कह दें तो ?
मदनिका--अरे, चन्द्रमा से धूप नहीं होती । (अर्थात् चारुदत्त ऐसा कृत्य नहीं कर सकता ।)
वसन्तसेना—धन्य हो मदनिके ! धन्य हो ।
टीका--मम=मदनिकायाः, श्रूयते=स्वीक्रियते, तत्=तस्मात्, तस्यैव=चारु-दत्तस्यैव, सम्बन्धसामान्ये षष्ठी बोध्या, प्रतिनिर्यातय = प्रत्यर्पय, राजकुले = राज-सभायाम्, न्यायालये इत्यर्थः, कथयति=वर्तमानसामीप्ये लट्, आतपः=घर्मः, यथा चन्द्रात् आतपो न समुदेति तथैव चारुदत्तेनेदं न सम्भाव्यते ।
अन्वयः--अस्मिन्, साहसे, मम, विषादः, भयम् वा, न, खलु, (अस्ति), त्वम्, तस्य, साधोः, गुणान्, कथम्, कथयसि ? हि, इदम्, कुत्सितम्, कर्म, वा, मम, लज्जाम्, जनयति, इह, नृपतिः, मादृशाम्, शठानाम्, किम्, नु, कुर्यात् ॥ २० ॥
शब्दार्थ--अस्मिन्=इस, साहसे=दुस्साहसिक चौर्य कार्य में, मम=मुझ शर्विलक का, विषादः=खेद, वा=अथवा, भयम्=डर, न=नहीं है, खलु=निश्चय ही, त्वम्=तुम मदनिका, तस्य = उस, साधोः = सज्जन (चारुदत्त) के, गुणान् = सद्गुणों को, किमर्थम्=किसलिये, कथयसि = कह रही हो ? हि=क्योंकि, इदम्=यह, कुत्सितं
२६० मृच्छकटिकम्
तथापि नीतिविरुद्धमेतत् । अन्य उपायश्चिन्त्यताम् । मदनिका—सो अअ अवरो उवाओ । ( सोऽयमपर उपायः । ) वसन्तसेना—को क्खु अवरो उवाओ भविस्सदि ? (कः खलु अपरं उपायो भविष्यति ? )
कर्म=निन्दित चोरी का कार्य ही, वा=निश्चित रूप से, मम=मुझ शर्विलक की, लज्जाम्=लाज को, जनयति=उत्पन्न कर रहा है । ( अर्थात् चोरी करने से ही मुझे लज्जा हो रही है । ) इह=इस विषय में, नृपतिः=राजा, मादृशाम्=हमारे जैसे, शठानाम्=धूतों का, किम् नु=क्या, कुर्यात्=कर सकेगा ? ॥ २० ॥
अर्थ—शर्विलक—मदनिके !
इस दुस्साहसिक ( चोरी के ) कार्य में, सचमुच, न तो किसी प्रकार का खेद ( पश्चात्ताप ) है और न ( राजा के दण्ड का ) भय है । इस स्थिति में तुम उन सज्जन चारुदत्त के गुणों का वर्णन क्यों कर रही हो ? क्योंकि यह चोरी करना कुत्सित कार्य ही मेरी लज्जा उत्पन्न कर रहा है। इस विषय में मेरे जैसे धूर्तों का राजा क्या कर सकता है ? अर्थात् कुछ नहीं कर सकता है ॥ २० ॥
टीका-—आत्मनः सामर्थ्यं प्रकटयन् मदनिकायाः, वचनं नीतिविरुद्धं प्रतिपाद- यन्नाह--न खल्विति । अस्मिन्=उपस्थिते, साहसे=चौर्यरूपे साहसिकर्मणि, मम=शर्विलकस्य, विषादः = खेदः, पश्चात्तापो वा, न खलु = नैवास्ति, त्वम्=मदनिका, साधोः = सज्जनस्य, तस्य = चारुदत्तस्य, गुणान् = दयादाक्षिण्यादीन्, किमर्थम्=किन्निमित्तम्, कथयसि=वर्णयसि ? हि=अवधारणे, वा=अथवा, इदम्=मयाचरितम्, इदम्, कुत्सितम्=निन्दितम्, कर्म = चौर्यम्, मम=शर्विलकस्य, लज्जाम्=ह्रियम्, जनयति = उत्पादयति, इह = अस्मिन् विषये, नगरे वा, नृपतिः = राजा, मादृशाम्=मादृशानाम्, शठानाम्=धूर्तानाम्, किम् नु, कुर्यात्=किं कतुं शक्नुयात्, न किमपीत्यर्थः । काव्यलिङ्गमलंकारः, मालिनी वृत्तम् ॥ २० ॥
विमर्श—साहसे—सहसा = बलेन, अविचारेण वा कृतम्-साहसम् = चौर्या- दिकम्, तत्र । विषादः=खेद, पश्चात्ताप । इह=इस नगर में, इस विषय में । यहाँ काव्यलिङ्ग अलंकार और मालिनी छन्द है ॥ २० ॥
**अर्थ—**फिर भी यह [ चोरों की ] नीति [ सिद्धान्त ] के विरुद्ध है । कोई दूसरा उपाय सोंचो ।
**मदनिका—**तो फिर यह दूसरा उपाय है ।
**वसन्तसेना—**दूसरा उपाय क्या होगा ?
चतुर्थोऽङ्कः <span style="float: right;">२६१</span>
मदनिका—तस्स ज्जेव अज्जस्स केरओ भविअ एदं अलङ्कारं अज्ज-आए उवणेहि। (तस्यैव आर्य्यस्य सम्बन्धी भूत्वा एतमलङ्कारमार्य्याया उपनय।)
शर्विलकः—एवं कृते किं भवति ?
मदनिका—तुमं दाव अचोरो, सो वि अज्जो अऋणो, अज्जआए सकं अलङ्कारं उवगदं भोदि। (त्वं तावदचौरः, सोऽपि आर्य्यः अनृणः, आर्य्यायाः स्वकः अलङ्कारक उपगतो भवति।)
शर्विलकः—ननु ! अतिसाहसमेतत्।
मदनिका—अइ ! उवणेहि। अण्णधा अदिसाहसं। (अयि ! उपनय। अन्यथा अतिसाहसम्।)
वसन्तसेना—साहु मदणिए ! साहु। अभुजिस्सए विअ मन्तिदं। (साधु, मदनिके ! साधु ! अभुजिष्ययेव मन्त्रितम्।)
शर्विलकः—
मयाप्ता महती बुद्धिर्भवतीमनुगच्छता।
निशायां नष्टचन्द्रायां दुर्लभो मार्गदर्शकः ॥ २१ ॥
मदनिका—उन आर्य चारुदत्त का ही सम्बन्धी बनकर इस अलंकार-समुदाय को आर्या [वसन्तसेना] के पास ले जाओ।
शर्विलक—ऐसा करने पर क्या होगा ?
मदनिका—पहली बात, तुम चोर नहीं रहोगे, [दूसरी बात] वे आर्य भी उऋण [धरोहर वापस करने वाले] हो जायेंगे और [तीसरी बात] आर्या बसन्तसेना को अपने आभूषण प्राप्त हो जायेगें।
शर्विलक—यह तो अतिदुःसाहस होगा।
मदनिका—अरे ले जाओ। अन्यथा [न ले जाने पर ही] अतिदुःसाहस [की बात] है।
वसन्तसेना—वाह मदनिके ! वाह ! विवाहिता स्त्री के समान सलाह दी है।
अन्वयः—भवतीम्, अनुगच्छता, मया, महती, बुद्धिः, आप्ता, नष्टचन्द्रायाम्, निशायाम्, मार्गदर्शकः, दुर्लभः [भवति] ॥ २१ ॥
शब्दार्थ—भवतीम्=आप मदनिका का, अनुगच्छता=अनुसरण करते हुये, मया=मुझ शर्विलक ने, महती=बड़ी, बुद्धिः=बुद्धि, सूझबूझ, आप्ता=प्राप्त कर ली है; नष्टचन्द्रायाम्=चन्द्रमा से रहित, निशायाम्=रात में, मार्गदर्शकः=राह दिखाने वाला, दुर्लभः=मिलना कठिन [होता] है ॥ २१ ॥
अर्थ—तुम्हारा अनुसरण करते हुये मुझ शर्विलक ने बहुत बड़ी बुद्धि=सूझ बूझ प्राप्त की है। चन्द्रमा [के प्रकाश] से रहित रात में राह दिखाने वाला कष्ट से प्राप्त होता है ॥ २१ ॥
२६२ मृच्छकटिकम्
मदनिका—तेण हि तुमं इमस्सिं कामदेवगेहे मुहुत्तअं चिट्ठ, जाव अज्जआए तुह आगमणं णिवेदेमि। (तेन हि त्वमस्मिन् कामदेवगेहे मुहूर्तकं तिष्ठ, यावदार्यायै तवागमनं निवेदयामि।)
शर्विलकः—एवं भवतु।
मदनिका—(उपसृत्य) अज्जए! एसो क्खु चारुदत्तस्स सकासादो बह्मणो आअदो। (आर्ये! एष खलु चारुदत्तस्य सकाशात् ब्राह्मणः आगतः।)
वसन्तसेना—हञ्जे! तस्स केरअं त्ति कथं तुमं जाणासि? (हञ्जे! तस्य सम्बन्धीति कथं त्वं जानासि?)
मदनिका—अज्जए! अत्तणकेरअं वि ण जानामि?। (आय्ये! आत्म-सम्बन्धिनमपि न जानामि?)
वसन्तसेना—(स्वगतं। सशिरःकम्पं विहस्य) जुज्जदि। (प्रकाशम्) पविसदु। (युज्यते। प्रविशतु)
टीका—मदनिकया पुनः प्रदर्शितस्य उपायस्य महत्त्वं स्वीकुर्वन् शर्विलकः तामेव प्रशंसन्नाह-मयेति। भवतीम्=मदनिकाम्, अनुगच्छता=अनुसरता सता, मया=शर्विलकेन, महती=उत्कृष्टा, बुद्धिः=ज्ञानम्, चातुर्यं वा, आप्ता=प्राप्ता; नष्ट-चन्द्रायाम्=लुप्तचन्द्रायाम् निशायाम्=रजन्याम्, मार्गदर्शकः=सत्पथप्रदर्शकः, दुर्लभः=दुष्प्रापः, भवति। अत्र भाग्यवशात् भवती मम मार्गदर्शिका जातेति भावः। अत्र वैधम्र्येण साम्यस्य गम्यतया दृष्टान्तालङ्कार इति बोध्यम्। अर्थान्तरन्यास इत्यपि केचित्। पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २१ ॥
विमर्श—यहाँ मदनिका के बुद्धिकौशल की प्रशंसा करता हुआ शर्विलक उसे अपनी ओर और अधिक आकृष्ट करना चाहता है ॥ २१ ॥
अर्थ—मदनिका—इस लिये तुम इस कामदेवगृह में कुछ देर के लिये ठहरो। तब तक मैं तुम्हारे आगमन की सूचना आर्या [वसन्ततिलका] को दे आती हूँ।
शर्विलक—ऐसा ही हो।
मदनिका—[वसन्तसेना के] (पास जाकर) आर्ये! आर्य चारुदत्त के पास से यह ब्राह्मण आया है।
वसन्तसेना—सखि! तुम कैसे जानती हो कि उन [आर्य चारुदत्त] का सम्बन्धी है?
मदनिका—आर्ये! अपने सम्बन्धीजन को भी नहीं पहचानूँगी?
वसन्तसेना—[अपने में, सिर हिलाकर हँसती हुई] ठीक है। (प्रकटरूप से) उन्हें आने दो।
चतुर्थोऽङ्कः २६३
मदनिका— जं अज्जआ आणवेदि । ( उपगम्य ) पविसदु सव्विल ओ ।
( यदार्या आज्ञापयति । प्रविशतु शर्विलकः । )
शर्विलकः— ( उपसृत्य । संवैलक्ष्यम् ) स्वस्ति भवत्यै ।
वसन्तसेना— अज्ज ! वन्दामि ! उवविसदु अज्जो । ( आर्य ! वन्दे । उपविशतु आर्यः । )
शर्विलकः— सार्थवाहस्त्वां विज्ञापयति—जर्जरत्वाद् गृहस्यं दूरक्ष्यमिदं भाण्डम्, तद् गृह्यताम् । ( इति मदनिकायाः समर्प्य प्रस्थितः । )
वसन्तसेना— अज्ज ! ममावि दाव पडिसन्देसं तहिं अज्जो णेदु ।
( आर्य ! ममापि तावत् प्रतिसन्देशं तत्रार्यो नयतु । )
शर्विलकः— (स्वगतम्) कस्तत्र यास्यति ? (प्रकाशम्) कः प्रतिसन्देशः ?
वसन्तसेना— पडिच्छदु अज्जो मदणिअं । ( प्रतीच्छतु आर्यो मदनिकाम् ।)
शर्विलक— भवति ! न खल्ववगच्छामि ।
वसन्तसेना— अहं अत्रगच्छामि । ( अहमवगच्छामि । )
शर्विलकः— कथमिव ? ।
वसन्तसेना— अहं अज्जचारुदत्तेण भणिदा—'जो इमं अलङ्कारअं समप्पइस्यदि, तस्म तुए मदणिआ दादव्वा ।' ता सो ज्जेव एदं दे देदित्ति एव्वं अज्जेण अवगच्छिद्वव्वं । ( अहमार्यचारुदत्तेन भणिता—य इममलङ्कारकं
मदनिका— आपकी जो आज्ञा । ( जाकर ) शर्विलक ! अन्दर चलिये ।
शर्विलक— ( आकर, लज्जाजनितव्यग्रता से ) आपका कल्याण हो ।
वसन्तसेना— आर्य ! प्रणाम करती हूँ । श्रीमान् बैठिये ।
शर्विलक— सार्थवाह ( चारुदत्त ) आप से निवेदन करते हैं—घर जीर्ण होने के कारण इस स्वर्णाभूषणभाण्ड की सुरक्षा कठिन हो गयी है, अतः इसे ले लीजिये । ( इस प्रकार मदनिका को देकर चल देता है । )
वसन्तसेना— आर्य ! मेरा भी प्रतिसन्देश उनके पास ले जाइये ।
शर्विलक— ( स्वगत ) वहाँ कौन जायगा ? ( प्रकाश ) क्या प्रतिसन्देश है ?
वसन्तसेना— आप मदनिका को स्वीकार करें ।
शर्विलक— आर्ये ! [ आपका तात्पर्य ] मैं नहीं समझ पा रहा हूँ ।
वसन्तसेना— मैं समझ रही हूँ ।
शर्विलक— किस प्रकार ?
वसन्तसेना— 'आर्य चारुदत्त ने मुझसे कहा था—'जो इस आभूषणसमुदाय को वापस लौटाये, उसको तुम [ वसन्तसेना ] मदनिका दे देना ।' इस प्रकार
२६४ | मृच्छकटिकम्
समर्पयिष्यति, तस्य त्वया मदनिका दातव्या' तत् स एव एतां ते ददातीति एवमार्येण अवगन्तव्यम् । )
शर्विलकः-- ( स्वगतम् ) अये ! विज्ञातोऽहमनया । ( प्रकाशम् ) साधु, आर्यचारुदत्त ! साधु ।
गुणेष्वेव हि कर्त्तव्यः प्रयत्नः पुरुषैः सदा ।
गुणयुक्तो दरिद्रोऽपि नेश्वरैरगुणैः समः ॥ २२ ॥
अपि च--
गुणेषु यत्नः पुरुषेण कार्यो न किञ्चिदप्राप्यतमं गुणानाम् ।
गुणप्रकर्षादुडुपेन शम्भोरलङ्घयमुल्लङ्घितमुत्तमाङ्गम् ॥ २३ ॥
वे [ चारुदत्त ] ही आपको मदनिका दे रहे हैं—इस प्रकार आपको समझ लेना चाहिये ।
शर्विलक—( मन में ) क्या इसने मुझे पहचान लिया ? ( प्रकट में ) धन्य हो आर्य चारुदत्त ! धन्य हो !
अन्वयः—पुरुषैः, सदा, गुणेषु, एव, प्रयत्नः कर्तव्यः, हि, गुणयुक्तः, दरिद्रः, अपि, अगुणैः, ईश्वरैः, समः, न, भवति ॥ २२ ॥
शब्दार्थ—पुरुषैः=लोगों के द्वारा, सदा=सर्वदा, गुणेषु=गुणों के विषय में, एव=ही, प्रयत्नः=उद्योग, कर्त्तव्यः=करना चाहिये, हि=क्योंकि, गुणवान्=गुणी, दरिद्रः=निर्धनः, अपि=भी, अगुणैः=गुणहीन, ईश्वरै=धनियों के, समः=बराबर, न=नहीं, भवति=होता है ॥ २२ ॥
अर्थ—लोगों को सदैव गुणों के विषय में [ उनकी प्राप्ति के लिये ] ही प्रयास करना चाहिये, क्योंकि गुणवान् निर्धन व्यक्ति भी गुणहीन धनियों के बराबर नहीं होता, अर्थात् उनसे श्रेष्ठ ही रहता है ॥ २२ ॥
टीका—गुणवता चारुदत्तेन पूर्वमेव विहितां स्वाभीष्टसिद्धिं शृण्वन् हृष्टः शर्विलकः चारुदत्तं प्रशंसति —गुणेष्वेवेति । पुरुषैः = सर्वैः जनैः, सदा = सर्वदा, गुणेषु = दयादाक्षिण्यादिषु, विषयसप्तमी, निमित्तसप्तमी वेति बोध्यम्, एव=निश्चयेन, प्रयत्नः=प्रयासः, कर्तव्यः=विधेयः, हि=यतः, गुणयुक्तः=गुणी, दरिद्रः=निर्धनः, अपि, अगुणैः=गुणहीनः, ईश्वरैः=धनिकैः, समः=तुल्यः, न=नैव, भवति=जायते, गुणी निर्धनोऽपि धनिकात् निर्गुणात् प्रशस्यतर इति भावः । अत्र कारणेन कार्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासोऽलंकारः । अनुष्टुप् वृत्तम् ॥ २२ ॥
विमर्शः—निर्धन होते हुये भी गुणों के कारण चारुदत्त की श्रेष्ठता ही है । अतः धन की अपेक्षा गुणों की प्राप्ति में प्रयास करना उचित है ॥ २२ ॥
अन्वयः—पुरुषेण, गुणेषु, यत्नः, कार्य, गुणानाम्, किञ्चित्, अपि, अप्राप्य-
चतुर्थोऽङ्कः २६५
वसन्तसेना---को एत्थ पवहणिओ । ( कोऽत्र प्रवहणिकः ? ) ( प्रविश्य सप्रवहणः )
तमम्, न, [ भवति ], उडुपेन, शम्भोः, अलङ्घ्यम्, उत्तमाङ्गम्, गुणप्रकर्षात्,
लङ्घितम् ॥ २३ ॥
**शब्दार्थः---**पुरुषेण=पुरुष के द्वारा, गुणेषु=दयादाक्षिण्य आदि गुणों के विषय में, यत्नः=प्रयास, कायः=किया जाना चाहिये, ( पुरुष को गुणों के विषय में प्रयास करना चाहिये । ) गुणानाम्=दया दाक्षिण्यादि गुणों को, किञ्चित्=कुछ, अपि=भी, वस्तु, अप्राप्यतमम्=दुर्लभ, ( प्राप्त करना कठिन ), न=नहीं, ( भवति=होती है ), उडुपेन=चन्द्रमा ने, शम्भोः=शंकर के, अलङ्घ्यम्=न उल्लङ्घनयोग्य, उत्तमाङ्गम्=मस्तक को, गुणप्रकर्षात्=गुणों के अतिशय ( महत्त्व ) के कारण, लङ्घितम्=लांघ लिया, उसके ऊपर स्थित हो गया ॥ २३ ॥
**अर्थ---**और भी,
पुरुष को ( दया दाक्षिण्यादि ) गुणों के विषय में प्रयास करना चाहिये, क्योंकि गुणों को कोई भी वस्तु प्राप्त करना कठिन नहीं है, चन्द्रमा ने शंकर के अलंघनीय मस्तक को गुणों के प्रकर्ष के कारण ही लांघ लिया, अर्थात् उसके ऊपर स्थित हो गया ॥ २३ ॥
**टीका---**चारुदत्तस्य गुणवत्तामेव प्रदर्शयन्नाह -गुणेष्विति । पुरुषेण=जनेन, गुणेषु=दयादाक्षिण्यादिषु, विषयसप्तमी चैषा, यत्नः=प्रयासः, कार्यः=करणीयः, गुणानाम्=दया-दाक्षिण्यादीनाम्, कर्तरि षष्ठीति बोध्यम्, किञ्चित् अपि=किमपि वस्तु, अप्राप्यतमम्=अतिदुष्प्रापम् न=नैव, ( भवति=विद्यते ) ; उडुपेन=तारापतिना, चन्द्रेणेत्यर्थः, कर्तरि तृतीया, शम्भोः=शङ्करस्य, अलङ्घ्यम्=केनापि अलङ्घनीयम् उत्तमाङ्गम् = 'उत्तमाङ्गं शिरः शीर्षम् इत्यमरः गुणप्रकर्षात् = गुणातिशयादेव, लङ्घितम् = उल्लङ्घ्य तदुपरि स्थितमिति भावः । अस्मिन् श्लोके तुणप्रकर्षात् चन्द्रकर्तृकशिरोलंघनरूपेण विशेषेण गुणवतः पुरुषस्य सकलकार्यक्षमत्वरूपस्य सामान्यस्य समर्थनात् विशेषेण सामान्यस्य समर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासोऽलङ्कारः । उपेन्द्रवज्रा वृत्तम् ॥ २३ ॥
**विमर्श---**भगवान् शंकर सर्वोपरि हैं। उनके अंगों में मस्तक सर्वोपरि है। किन्तु चन्द्रमा उस मस्तक के भी ऊपर बैठा है। इसमें चन्द्रमा के गुणों का प्रकर्ष ही कारण है। अतः गुणीजन की श्रेष्ठता स्पष्ट है। यहाँ विशेष के द्वारा सामान्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है ॥ २३ ॥
अर्थ---
**वसन्तसेना---**यहाँ कोई गाड़ीवान है ?
( गाड़ी के साथ प्रवेश करके )
२६६ मृच्छकटिकम्
चेटः—अज्जए ! सज्जं पवहणं । ( आर्ये ! सज्जं प्रवहणम् । )
वसन्तसेना—हञ्जे मदणिए ! सुंदिदठं मं करेहि । दिण्णासि । आरोह पवहणं । सुमरेसि मं । ( हञ्जे मदनिके ! सुदृष्टां मां कुरु । दत्ताऽसि । आरोह प्रवहणम् । स्मरसि माम् । )
मदनिका—( रुदती ) परिच्चत्तेम्हि अज्जआए । ( परित्यक्ताऽस्मि आर्य्यया । ) ( इति पादयोः पतति । )
वसन्तसेना—सम्पदं तुमं ज्जेव वन्दणीआ संवुत्ता । ता गच्छ, आरोह पवहणं । सुमरेसि मं । ( साम्प्रतं त्वमेव वन्दनीया संवृत्ता । तद् गच्छ, आरोह प्रवहणम्, स्मरसि माम् )
शर्विलकः—स्वस्ति भवत्यै । मदनिके !
सुदृष्टः क्रियतामेष शिरसा वन्द्यतां जनः ।
यत्र ते दुर्लभं प्राप्तं वधूशब्दावगुण्ठनम् ॥ २४ ॥
चेट—आर्ये ! गाड़ी तैयार है ।
वसन्तसेना—सखी मदनिके ! मुझे अच्छी प्रकार देख लेने दो । तुम ( शर्विलक को ) समर्पित की जा चुकी हो । गाड़ी पर सवार हो जाओ । मुझे याद रखना ।
मदनिका—( रोती हुई ) आपने मुझे छोड़ दिया । ( इस प्रकार पैरों पर गिर पड़ती है । )
वसन्तसेना—इस समय तुम्हीं पूजनीया हो गई हो । अतः जाओ, गाड़ी पर सवार हो जाओ । मुझे याद रखना ।
शर्विलक—( वसन्तसेना जी ! ) आप का कल्याण हो ।
अन्वयः—मदनिके !, एषः, जनः, सुदृष्टः, क्रियताम्, ( तथा ) शिरसा, वन्द्यताम्; यत्र, ते, दुर्लभम्, वधूशब्दावगुण्ठनम्, प्राप्तम् ॥ २४ ॥
शब्दार्थ—मदनिके ! एषः=यह ( वसन्तसेना ), जनः=व्यक्ति, सुदृष्टः=अच्छी प्रकार देखा गया, क्रियताम्=कर दिया जाय, ( तथा=और ) शिरसा=मस्तक से, वन्द्यताम्=बन्दना की जाय अर्थात् इनका दर्शन अच्छी प्रकार से करो और इन्हें शिर झुका कर प्रणाम करो । यत्र=जिसके कारण अथवा जिसके अनुकम्पायुक्त होने पर, ते=तुमको, दुर्लभम्=दुर्लभ, वधूशब्दावगुण्ठनम्=वधू-विवाहित स्त्री शब्दरूपी घूंघट, प्राप्तम्=प्राप्त हो सका ॥ २४ ॥
अर्थ—मदनिके ! इन [ वसन्तसेना जी ] का दर्शन अच्छी प्रकार से करो ( और ) शिर से प्रणाम करो । इनके कारण [ अथवा इनके अनुकम्पायुक्त होने पर ही ] तुमको दुर्लभ वधू (विवाहित स्त्री)-शब्दरूपी घूंघट प्राप्त हो सका ॥२४॥
चतुर्थोऽङ्कः २६७
( इति मदनिकया सह प्रवहणमारुह्य गन्तुं प्रवृत्तः । )
( नेपथ्ये ) कः कोऽत्र भोः ! राष्ट्रियः समाज्ञापयति—'एष खलु आर्य्यको गोपालदारको राजा भविष्यती'ति सिद्धादेशप्रत्ययपरित्रस्तेन पालकेन राज्ञा घोषादानीय घोरे बन्धनागारे बद्धः। ततः स्वेषु स्वेषु स्थानेषु अप्रमत्तैर्भवद्भिर्भवितव्यम्।
टीका—वसन्तसेनायाः अनुकम्पातः प्राप्ताभीष्टः शर्विलकः तां प्रति कृतज्ञत्वं विज्ञापयितुं मदनिकामादिशन्नाह—सुदृष्ट इति। मदनिके ! एषः=पुरः स्थितः, जनः=वसन्तसेनारूपः, सुदृष्टः = शोभनावलोकितः, क्रियताम्=विधीयताम्; तथा, शिरसा = मस्तकेन, मस्तकमनमनपूर्वमित्यर्थः, वन्द्यताम् = अभिवाद्यताम्। यत्र=अस्मिन् जने अनुकम्पमाने सति, हेतौ आधारविवक्षायां वा सप्तमी बोध्या, ते=तव ( कर्त्तरि षष्ठी ), मदनिकायाः इत्यर्थः, दुर्लभम्=वेश्यादासीत्वेन दुर्लभम्, वधूशब्दावगुण्ठनम् = वधूशब्दवाच्यरूपम् एव अवगुण्ठनम् = आवरणम्, वधूशब्देन सह अवगुण्ठनम् वधूशब्दः अवगुण्ठनञ्चैतद् द्वयमित्यभिप्रायः। एवञ्च ते सामाजिकी प्रतिष्ठा सञ्जातेति कृतज्ञतां दर्शयेति भावः। अत्र पूर्वार्द्धगतवाक्यार्थं प्रति परार्द्धगतवाक्यार्थस्य हेतुतया काव्यलिङ्गमलङ्कारः। पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २४ ॥
विमर्श—सामान्यरूप से दासीत्व से मुक्ति पाना कठिन है और उस पर भी वधू=विवाहित पत्नी का पद प्राप्त करना और भी कठिन है। परन्तु वसन्तसेना की कृपा से यह सम्भव हो सका है। अतः उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना अत्यन्त आवश्यक है। वधू बन जाने के बाद वेश्या वसन्तसेना के घर आना समाजविरुद्ध है। अतः उस उपकारिका का भलीभाँति दर्शन और प्रणाम करने के लिये शर्विलक का कहना सर्वथा उचित है। पूर्व के वाक्यार्थ के प्रति उत्तरार्ध वाक्यार्थ हेतु है। अतः काव्यलिङ्ग अलंकार और पथ्यावक्र छन्द है ॥ २४ ॥
( इस प्रकार मदनिका के साथ गाड़ी पर चढ़ कर चलने लगता है । )
अर्थ ( नेपथ्य में ) अरे यहाँ कौन कौन है ? राष्ट्रिय ( राजा का शाला शकार अथवा राजपुरुष) यह सूचित करते हैं—'यह गोपालदारक (अहीर का लड़का) राजा होगा'—इस प्रकार के किसी सिद्ध पुरुष के वचन पर विश्वास करने से घबड़ाये हुये राजा पालक ने घोष ( अहीरों की वस्ती ) से लाकर कठोर जेलखाने में बन्द कर रखा है। इस लिये सभी ( पहरेदारों ) को अपने अपने स्थानों पर सावधान हो जाना चाहिये।
टीका—राष्ट्रियः = राजश्यालकः अथवा राष्ट्ररक्षायां नियुक्तोऽधिकारी। 'राष्ट्रावारपाराद्घखौ' इति घ-प्रत्ययः। गोपालस्य=आभीरकस्य, दारकः=पुत्रः, सिद्धस्य=सिद्धिम्रत ऋषेः, आदेशे=कथने, भविष्यद्वाण्यामिति भावः, यः प्रत्ययः=
२६८ मृच्छकटिकम्
शर्विलकः-- ( आकर्ण्य ) कथं राज्ञा पालकेन प्रियसुकृद्दार्यको मे बद्धः। कलत्रवांश्चास्मि संवृत्तः। आः, कष्टम्। अथवा--
द्वयमिदमतीव लोके प्रियं नराणां सुहृच्च वनिता च । सम्प्रति तु सुन्दरीणां शतादपि सुहृद्विशिष्टतमः ॥ २५ ॥
विश्वासः, तेन त्रस्तः = भीतः, तेन, घोषः = आभीरपल्ली, तस्मात् । अप्रमत्तैः= सावधानैः, स्थानेषु=पदेषु कर्त्तव्येषु वा ।
अर्थ-- शर्विलक -( सुनकर ) क्या राजा पालक ने मेरे प्रिय मित्र आर्यक को जेल में बन्द कर दिया हैं ? इधर मैं स्त्रीवाला हो गया हूँ । ओह ! कष्ट है ।
**अन्वयः--**लोके, सुहृत्, वनिता, च, इदम्, द्वयम्, नराणाम्, अतीव, प्रियम्, तु, सम्प्रति, सुन्दरीणाम्, शतात्, अपि, सुहृत्, विशिष्टतमः, ( अस्ति ) ॥ २५ ॥
**शब्दार्थ --**लोके = संसार में, सुहृत् = मित्र, च = और, वनिता = स्त्री, इदम् = यें, द्वयम् = दोनों, नराणाम् = लोगों की, अतीव = बहुत अधिक, प्रियम् = प्रिय ( होती हैं ); तु = किन्तु, सम्प्रति = इस समय, सुन्दरीणाम् = सुन्दर स्त्रियों के, शतात् = सौ से, अपि = भी अर्थात् सैकड़ों सुन्दर स्त्रियों से भी, सुहृत् = मित्र, विशिष्टतमः = श्रेष्ठ, सबसे प्रिय, ( अस्ति = है ) ॥ २५ ॥
**अर्थ --**अथवा, इस संसार में मित्र और स्त्री ये दो वस्तुये लोगों को सबसे अधिक प्रिय होती हैं । किन्तु इस समय सैकड़ों सुन्दर स्त्रियों से भी मित्र अधिक प्रिय है अर्थात् मित्र की उपेक्षा नहीं कर सकता हूँ ॥ २५ ॥
**टीका --**सुहृत्कलत्रयोरुभयोरेव प्रियतमत्वेऽपि कलत्रापेक्षया सुहृद एव प्रियतमत्वमधिकमिति प्रतिपादयन्नाह--द्वयमिति । लोके=संसारे, सुहृत्=मित्रम्, वनिता=प्रेयसी स्त्री, च, इदम्=एतद्द्वयम्, अतीव = अत्यधिकम्, प्रियम्=प्रीतिकरम्, भवति; तु = किन्तु, सम्प्रति = इदानीं सकलत्रतावस्थायाम्, सुन्दरीणाम्=स्त्रीणाम्, शतात्=शतसंख्यायाः, अपि, सुहृत्=मित्रम्, विशिष्टतमः=अधिकप्रिय इत्यर्थः । विपत्तिकाले स्त्रियमपेक्ष्यापि मित्रस्य साहाय्यं कार्यमिति भावः । अत्र द्वयोर्मध्ये प्रकर्षकथने तरप्प्रत्ययस्यैवौचित्यम् । अत्र 'आश्रयो' नाम नाट्यालङ्कार इति जीवानन्दः । आर्या वृत्तम् ॥ २५ ॥
**विमर्श --**मित्र और स्त्री में विपत्ति के समय मित्र की सहायता करनी उचित हैं। यहाँ मित्रता का उत्कृष्टत्व माना है । **विशिष्टतमः--**यहाँ तमप् की अपेक्षा तरप् प्रत्यय उचित है, क्योंकि दो में ही एक का प्रकर्ष निर्धारित करना है ॥ २५ ॥
चतुर्थोऽङ्कः
२६६
भवतु, अवतरामि । ( इत्यवरति । )
मदनिका— (सास्रमञ्जलिं बद्ध्वा) एव्वं णेदं । ता परं णेदु मं अज्जउत्तो समीवं गुरुअआणं । (एवं न्विदम् । तत्परं नयतु मामार्यपुत्रः समीपं गुरुजनानाम् ।)
शर्विलकः—साधु, प्रिये ! साधु । अस्मच्चित्तसदृशमभिहितम् । (चेटमुद्दिश्य ) भद्र ! जानीषे रेभिलस्य सार्थवाहस्य उदवसितम् ?
चेटः—अध इं । ( अथ किम् । )
शर्विलकः—तत्र प्रापय प्रियाम् ।
चेटः—जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य याज्ञापयति । )
मदनिका—जधा अज्जउत्तो भणादि अप्पमत्तेन दाव अज्जउत्तेण होदव्वं । ( यथा आर्यपुत्रो भणति, अप्रमत्तेन तावदार्यपुत्रेण भवितव्यम् । ) ( इति निष्क्रान्ता । )
शर्विलकः —अहमिदानीम्—
ज्ञातीन् विटान् स्वभुजविक्रमलब्धवर्णान्
राजापमानकुपितांश्च नरेन्द्रभृत्यान् ।
उत्तेजयामि सुहृदः परिमोक्षणाय
यौगन्धरायण इवोदयनस्य राज्ञः ॥ २६ ॥
**अर्थ—**अच्छा, उतरता हूँ । ( इस प्रकार उतरता है । )
मदनिका—( आँसू भरी आंखों के साथ हाथ जोड़कर ) यह ऐसा ही उचित है। तो आर्यपुत्र मुझे गुरुजनों ( परिवार के बड़े लोगों ) के समीप ले चलें ।
**शर्विलक—**वाह ! प्रिये वाह ! मेरे मन के अनुसार ही तुमने कहा है । ( चेट को लक्षित करके ) श्रीमन् ! सार्थवाह ( श्रेष्ठ व्यापारी ) रेभिल का आवास ( घर ) जानते हो ?
**चेट—**और क्या ?
**शर्विलक—**तो प्रिया ( मदनिका ) को वहाँ पहुँचा दो ।
**चेट —**आपकी जो आज्ञा ।
**मदनिका—**जैसा आप कहते हैं, आर्यपुत्र आप को सावधान रहना चाहिये । ( इस प्रकार निकल जाती है । )
**अन्वयः—**उदयनस्य, राज्ञः, यौगन्धरायणः, इव, सुहृदः, परिमोक्षणाय, ( अहम् ), ज्ञातीन्, विटान्, स्वभुजविक्रमलब्धवर्णान्, राजापमानकुपितान्, नरेन्द्र-भृत्यान्, च, उत्तेजयामि ॥ २६ ॥
चतुर्थोऽङ्कः २६६
भवतु, अवतरामि । ( इत्यवतरति । )
मदनिका—(सास्रमञ्जलिं बद्ध्वा) एवं णेदं । ता परं णेदु मं अज्जउत्तो समीवं गुरुअआणं । ( एवं न्विदम् । तत्परं नयतु मामार्यपुत्रः समीपं गुरुजनानाम् ।)
**शर्विलकः—**साधु, प्रिये ! साधु । अस्मच्चित्तसदृशमभिहितम् । (चेटमुद्दिश्य ) भद्र ! जानीषे रेभिलस्य सार्थवाहस्य उदवसितम् ?
**चेटः—**अध इं । ( अथ किम् । )
**शर्विलकः—**तत्र प्रापय प्रियाम् ।
**चेटः—**जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य याज्ञापयति । )
**मदनिका—**जधा अज्जउत्तो भणादि अप्पमत्तेण दाव अज्जउत्तेण होदव्वं । ( यथा आर्यपुत्रो भणति, अप्रमत्तेन तावदार्यपुत्रेण भवितव्यम् । ) ( इति निष्क्रान्ता । )
शर्विलकः —अहमिदानीम्—
ज्ञातीन् विटान् स्वभुजविक्रमलब्धवर्णान्
राजापमानकुपितांश्च नरेन्द्रभृत्यान् ।
उत्तेजयामि सुहृदः परिमोक्षणाय
यौगन्धरायण इवोदयनस्य राज्ञः ॥ २६ ॥
**अर्थ—**अच्छा, उतरता हूँ । ( इस प्रकार उतरता है । )
मदनिका—( आँसू भरी आँखों के साथ हाथ जोड़कर ) यह ऐसा ही उचित है । तो आर्यपुत्र मुझे गुरुजनों ( परिवार के बड़े लोगों ) के समीप ले चलें ।
**शर्विलक—**वाह ! प्रिये वाह ! मेरे मन के अनुसार ही तुमने कहा है । ( चेट को लक्षित करके ) श्रीमन् ! सार्थवाह ( श्रेष्ठ व्यापारी ) रेभिल का आवास ( घर ) जानते हो ?
**चेट—**और क्या ?
**शर्विलक —**तो प्रिया ( मदनिका ) को वहाँ पहुँचा दो ।
**चेट —**आपकी जो आज्ञा ।
**मदनिका—**जैसा आप कहते हैं, आर्यपुत्र आप को सावधान रहना चाहिये । ( इस प्रकार निकल जाती है । )
**अन्वयः—**उदयनस्य, राज्ञः, यौगन्धरायणः, इव, सुहृदः, परिमोक्षणाय, ( अहम् ), ज्ञातीन्, विटान्, स्वभुजविक्रमलब्धवर्णान्, राजापमानकुपितान्, नरेन्द्र-भृत्यान्, च, उत्तेजयामि ॥ २६ ॥
| १७० | मृच्छकटिकम् |
|---|
शब्दार्थ —उदयनस्य=उदयन=वत्सराज, राज्ञः=राजा के ( छुड़ाने के लिये ), योगन्धरायण=यौगन्धरायण ( नामक महामात्य ) के, इव=समान, सुहृदः=मित्र आर्यक की, परिक्षोक्षणाय=मुक्ति के लिये ( अहम्=मैं शर्विलक ), ज्ञातीन्=कुल के बन्धु बान्धवों, विटान्=विटों, धूतों को, स्वभुजविक्रमलब्धवर्णान्=अपनी बाहुओं के पराक्रम से यश प्राप्त करने वालों को, च=और, राजापमानकुपितान्=राजा द्वारा किये गये अपमान से क्रुद्ध, नरेन्द्रभृत्यान्=राजा के कर्मचारियों को, उत्तेजयामि=उत्तेजित करता हूँ, राजा के विरुद्ध तैयार करता हूँ, उकसाता हूँ ।। २६ ।।
अर्थ—शर्विलक —मैं इस समय --
उदयन ( वत्सराज ) नामक राजा की ( मुक्ति के लिये ) यौगन्धरायण ( उनके महामात्य ) के समान ( मैं शर्विलक ) मित्र आर्यक को छुड़ाने के लिये ( राजा पालक के ) बन्धुओं, अपनी भुजाओं के पराक्रम से यश प्राप्त करने वालों, और राजा द्वारा किये गये अपमान से क्रुद्ध कर्मचारियों को ( राजा के विरुद्ध ) उत्तेजित करता हूँ, उकसाता हूँ ।। २६ ।।
टीका—सुहृद्बन्धनमाकर्ण्य शर्विलकस्तन्मोक्षोपायं निर्धारयन्नाह--ज्ञातीनिति । उदयनस्य=उदयनेति नाम्ना प्रसिद्धस्य, राज्ञः=नृपस्य, वत्सराजस्येत्यर्थः, (मोक्षणाय) योगन्धरायणः=तन्नाम्ना प्रसिद्धः प्रधानामात्यः, इव, सुहृदः=मित्रस्य, आर्यकस्येत्यर्थः, परिक्षोक्षणाय = कारागारात् मोचनार्थम्, ज्ञातीन् = बान्धवान्, विटान्=धूर्तान्, स्वभुजविक्रमलब्धवर्णान्=निजबाहूनां पराक्रमेण लब्धः=प्राप्तः, वर्णः=यशः यैस्तान् 'वर्णो द्विजातिशुक्लादियशोगुणकथासु चे'त्यमरः; अथवा स्वभुजविक्रमेण=स्वबाहु-विक्रमप्रकाशेन, लब्धवर्णान्=विचक्षणान् 'लब्धवर्णो विचक्षणः' इत्यमरः, राजाप-मानकुपितान्=राज्ञः पालकस्य अवमानेन क्रुद्धान्, कर्तरि षष्ठी, पालककृतावज्ञया क्रोधयुतान्, नरेन्द्रभृत्यान्=राजपुरुषान्, च, उत्तेजयामि=प्रोत्साहयामि, राज्ञः पाल-कस्य विनाशाय प्रेरयामीति भावः । अत्रोपमालङ्कारः । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥२६॥
विमर्श—पुराणों में यह कथा है कि वत्सराज उदयन को उज्जयिनी के राजा चन्द्रसेन ने कारागार में बन्द कर दिया था । तब उदयन के महामात्य यौगन्धरायण ने अपने बुद्धिकौशल से प्रजा में विद्रोह उत्पन्न कराकर अपने राजा उदयन को मुक्त कराया था । शर्विलक भी अपने मित्र और भावी राजा पालक की मुक्ति इसी प्रकार कराना चाहता है । 'सगोत्रबान्धवज्ञातिबन्धु —स्वस्वजनाः स्मृताः' अमरकोश ।' 'वर्णो द्विजातिशुक्लादियशोगुणकथासु च' मेदिनीकोश । उत्तेजयामि-उत्पूर्वक√तिज निशाने' चौरादिक धातु ॥ २६ ॥
चतुर्थोऽङ्कः २७१
अपि च—
प्रियसूहृदमकारणे गृहीतं रिपुभिरसाधुभिराहितात्मशङ्कैः । सरभसमभिपत्य मोचयामि स्थितमिव राहुमुखे शशाङ्कविम्बम् ॥ २७ ॥
( इति निष्क्रान्तः । ) ( प्रविश्य )
चेटी—अज्जए ! दिट्ठिआ वड्ढसि । अज्जचारुदत्तस्स सकासादो बम्हणो आदो । (आर्ये ! दिष्ट्या वर्द्धसे । आर्यचारुत्तस्य सकाशात् ब्राह्मण आगतः । )
वसन्तसेना—अहो ! रमणीअदा अज्ज दिवसस्स । ता हज्जे ! सादरं
अन्वयः—अकारणे, आहितात्मशङ्कैः, असाधुभिः, रिपुभिः गृहीतम्, राहुमुखे, स्थितम्, शशाङ्कविम्बम्, इव, प्रियसूहृदम्, सरभसम्, अभिपत्य, मोचयामि ।।२७।।
शब्दार्थ—अकारणे=कोई कारण न रहने पर भी, आहितात्मशङ्कः=अपने में भय बना लेने वाले, असाधुभिः=दुष्ट, रिपुभिः=शत्रुओं के द्वारा, गृहीतम्=कारागार में बन्द किये गये, राहुमुखे=राहुग्रह के मुख में; स्थितम्=विद्यमान, शशाङ्क-विम्बम्=चन्द्रमण्डल, इव=के समान, प्रियसूहृदम्=प्रियमित्र आर्यक को, सरभसम्=वेगपूर्वक, अभिपत्य=आक्रमण करके, शत्रुओं पर चढ़ कर, मोचयामि=कारागार से बाहर निकालता हूँ ।। २७ ।।
अर्थ—और भी,
कोई कारण न रहने पर भी अपने में भय मानने वाले दुष्ट शत्रुओं द्वारा बन्धन में डाले गये, राहु के मुख में वर्तमान चन्द्रमा के समान, अपने प्रिय मित्र को वेगपूर्वक आक्रमण करके छुड़ाता हूँ ।। २७ ।।
( यह कह कर निकल जाता है ! )
टीका—अकारणे=कारणाभावे सत्यपि, आहितात्मशङ्कैः=आहिता=स्थापिता, आत्मनि=स्वस्मिन्, शङ्का=भयम्, यैस्तैः, अकारणस्वभययुक्तैः, असाधुभिः=दुष्टैः, रिपुभिः=शत्रुभिः, गृहीतम्=कारागारे निगृहीतम्, राहुमुखे=राहुनामकस्य राक्षसस्य आनने, स्थितम्=वर्तमानम्, निगीर्णम् इत्यर्थः, शशाङ्कबिम्बम्=चन्द्रमण्डलम्, इव, प्रियसूहृदम्=परममित्रमार्यकम्, सरभसम्=सवेगं यथा स्यात् तथा, अभिपत्य=आक्रम्य, मोचयामि=मुक्तबन्धनं करोमि । अत्रोपमालङ्कारः । पुष्पिताग्रा वृत्तम् ।२७।
( प्रवेश करके )
अर्थ—चेटी—आर्ये ! आपका सौभाग्य है । आर्य चारुदत्त के पास से ब्राह्मण आया है ।
वसन्तसेना—अहा, आज का दिन कितना अच्छा है । अतः हे सखि ।
२७१ | मृच्छकटिकम्
बन्धुलेण समं पवेसेहि णं । ( अहो ! रमणीयता अद्य दिवसस्य । तत् हञ्जे ! सादरं बन्धुलेन समं प्रवेशय एनम् । )
चेटी—जं अज्जआ आणवेदि ; (इति निष्क्रान्ता ।) (यदार्या आज्ञापयति ।)
( विदूषको बन्धुलेन सह प्रविशति ।)
विदूषकः—होही भोः ! तवच्चरणकिलेसविणिज्जिदेण रक्खसराओ रावणो पुष्फकेण विमाणेण गच्छदि; अहं उण वम्हणो अकिदतवच्चरण-किलेसो वि णरनारीजणेण गच्छामि । ( आश्चर्यं भोः ! तपश्चरणक्लेशविनि-र्जितेन राक्षसराजो रावणः पुष्पकेण विमानेन गच्छति; अहं पुनर्ब्राह्मणोऽकृततप-श्चरणक्लेशोऽपि नरनारीजनेन गच्छामि । )
चेटी—पेक्खदु अज्जो अम्हकेरकं गेहदुआरं । ( प्रेक्षतामार्यः अस्मदीयं गेहद्वारम् । )
विदूषकः—( अवलोक्य सविस्मयम् ) अम्मो ! सलिल-सित्त-मज्जिद-किदहरिदोवलेवणस्स, विविह-सुअन्धिकुसुमोवहार-चित्तालहिद-भूमि-भाअस्स, गअणतलालोअण-कोदूहल-दूरुणामिदसीसस्स, दोलाअमाणाव-लम्बिदेरावण-हत्थब्भमाइद-मल्लिआदामजुणालङ्किदस्स, समुच्छिद-
बन्धुल के साथ आदरसहित उसे यहाँ लाओ ।
चेटी—आपकी जैसी आज्ञा । ( इस प्रकार निकल जाती है । )
( बन्धुल के साथ विदूषक प्रवेश करता है । )
शब्दार्थ—तपश्चरणक्लेशविनिर्जितेन=तपस्या के कष्टों से प्राप्त होने वाले, पुष्पकेण=कुबेर के पुष्पकनामक विमान से, अकृततपश्चरणक्लेशः=तपस्या करने के कष्ट को न भोगने वाला । नरनारीजनेन = सामान्यजनों की नारीजनों=वेश्याजनों के साथ ।
टीका—तपश्चरणस्य=तपोऽनुष्ठानस्य, यः क्लेशः=कष्टम् तेन विनिर्जितेन=प्राप्तेन, पुष्पकेण=कुबेरसम्बन्धिना, विमानेन=व्योमयामेन, राक्षसराजः=राक्षसाधि-पतिः, अहम् = विदूषकः, अकृततपश्चरणक्लेशः = तपश्चरणस्य क्लेशः, न कृतः तपश्चरणक्लेशः येन स तादृशः । नरनारीजनेन=नाराणाम्=सामान्यजनानाम्, नारी-जनेन=वेश्याजनेन सह, गच्छामि । यथा रावणः पुष्पकविमानेन सुखमनुभवति स्म तथैवाहं नरनारीजेनानुभवामि ।
अर्थ—विदूषक—अहो ! आश्चर्य है । राक्षसों का राजा रावण तपस्या के क्लेश से प्राप्त पुष्पक विमान से यात्रा करता था । किन्तु मैं ब्राह्मण तपस्या का कष्ट उठाये बिना ही वेश्याजनों के साथ ( सुखपूर्वक ) जा रहा हूँ ।
चेटी—आर्य, हमारे घर का दरवाजा देखिये ।
चतुर्थोऽङ्कः २७३
दन्ति-दन्ततोरणावभासिदस्स, महारअणोवराओवसोहिणा पवणबलन्दोलणा-ललन्तचञ्चलगृहत्थेण, 'इदो एहि' त्ति वाहरन्तेण विअ मं सोहग्गपड़ा-आणिवहेणोवसोहिदस्स, तोरणधरणत्थम्भवेदिआ-णिक्खित्त-समुल्लसन्त-हरिदचूदपल्लवललामफटिअ-मङ्गल-कलसाहिरामोभयपासस्स, महासुरवक्खत्थलदुब्भेज्जवज्जणिरन्तरपडिवद्धकण अकवाड़स्स, दुग्गदजणमणोरहाआसकरस्स, वसन्तसेणा-भवण-दुआरस्स सस्सिरीअदा । जं सच्चं मज्झत्थस्स वि जणस्स वलादिट्ठिं आआरेदि । ( अहो ! सलिल-सिक्त-मार्जित-कृत-हरितोपलेपनस्य, विविध-सुगन्धिकुसुमोपहार-चित्रलिखितभूमि-
शब्दार्थ—सलिलसिक्त-मार्जित-कृत-हरितोपलेपनस्य = पानी से सींचकर = छिड़क कर, झाड़ू से साफ कर गोबर से लीपे गये, विविध-सुगन्धि-कुसुमोपहार-चित्रलिखित-भूमिभागस्य = विभिन्न प्रकार के सुगन्धित फूलों की रचनाओं से चित्रयुक्त भूमिभागवाले, गगनतलावलोकन-कौतूहल-दूरोन्नमितशीर्षस्य = आकाश को देखने की उत्सुकता से बहुत ऊँचाई तक शिर को उठाने वाले, दोलायमानाव लम्बितैरावण-हस्तभ्रमायित-मल्लिकादाम-गुणालङ्कृतस्य = हिलने वाली, लटकने वाली, ऐरावत हाथी सूँड़ के भ्रम को पैदा करने वाली मल्लिका के फूल की मालाओं से सजे हुए, समुच्छ्रित-दन्ति-दन्त-तोरणावभासितस्य = बहुत ऊँचे, हाथी दाँत के तोरण से सुशोभित, महारत्नोपरागशोभिना = बड़े बड़े रत्नों के उपराग = रंग से शोभायुक्त, पवनबलान्दोलनाललच्चञ्चलाग्रहस्तेन = हवा के झोंको से हिलने से कम्पमान एवं चञ्चल अग्रभागरूपी हाथ से, इतः = इधर, एहि = आइये, इति = इस प्रकार, माम् = मुझको, व्याहरता = बुलाते हुये, इव = से, सौभाग्यपताकानिवहेन = मङ्गलसूचक पताकाओं के समूह से, उपशोभितस्य = सुशोभित, तोरण-धरण-स्तम्भवेदिका-निक्षिप्तसमुल्लसद्धरित-चूतपल्लव-ललाम-स्फटिकमङ्गल-कलसाभिरामोभयपार्श्वस्य = बाहरी दरवाजों को धारण करने के लिये बनाये खम्भों की चौकियों पर रखे गये, सुन्दर हरे आम के पत्तों से शोभायमान, स्फटिकमणियोँ के मङ्गल कलसों से शोभित दोनों भाग वाले, महासुर-वक्षःस्थल-दुर्भैद्य-वज्र-निरन्तर-प्रतिवद्ध-कनक-कपाटस्य = महान् असुर = हिरण्यकशिपु की छाती के समान दुर्भेद्य = फाड़ने में कठिन तथा वज्र = हीरा की कीलों से जटित सोने के किवाड़ों वाले, दुर्गंतजन-मनोरथायासकरस्य = निर्धन लोगों की अभिलाषा का परिश्रम कराने वाले, वसन्तसेना-द्वारस्य = वसन्तसेना के दरवाजे की, सश्रीकता = सुन्दरता = सम्पन्नता । मध्यस्थस्य = उदासीन की, आकारयति = खींच लेता है !
अर्थ—विदूषक—( देखकर आश्चर्यचकित होकर ) अहो ! जहाँ पानी छिड़क कर, झाडू लगा कर गोबर से लीपा गया है; जहाँ का भूमिभाग विभिन्न
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