भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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चतुर्थोऽङ्कः २६६

भवतु, अवतरामि । ( इत्यवतरति । )
मदनिका—(सास्रमञ्जलिं बद्ध्वा) एवं णेदं । ता परं णेदु मं अज्जउत्तो समीवं गुरुअआणं । ( एवं न्विदम् । तत्परं नयतु मामार्यपुत्रः समीपं गुरुजनानाम् ।)
**शर्विलकः—**साधु, प्रिये ! साधु । अस्मच्चित्तसदृशमभिहितम् । (चेटमुद्दिश्य ) भद्र ! जानीषे रेभिलस्य सार्थवाहस्य उदवसितम् ?
**चेटः—**अध इं । ( अथ किम् । )
**शर्विलकः—**तत्र प्रापय प्रियाम् ।
**चेटः—**जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य याज्ञापयति । )
**मदनिका—**जधा अज्जउत्तो भणादि अप्पमत्तेण दाव अज्जउत्तेण होदव्वं । ( यथा आर्यपुत्रो भणति, अप्रमत्तेन तावदार्यपुत्रेण भवितव्यम् । ) ( इति निष्क्रान्ता । )
शर्विलकः —अहमिदानीम्—

ज्ञातीन् विटान् स्वभुजविक्रमलब्धवर्णान्
राजापमानकुपितांश्च नरेन्द्रभृत्यान् ।
उत्तेजयामि सुहृदः परिमोक्षणाय
यौगन्धरायण इवोदयनस्य राज्ञः ॥ २६ ॥


**अर्थ—**अच्छा, उतरता हूँ । ( इस प्रकार उतरता है । )
मदनिका—( आँसू भरी आँखों के साथ हाथ जोड़कर ) यह ऐसा ही उचित है । तो आर्यपुत्र मुझे गुरुजनों ( परिवार के बड़े लोगों ) के समीप ले चलें ।
**शर्विलक—**वाह ! प्रिये वाह ! मेरे मन के अनुसार ही तुमने कहा है । ( चेट को लक्षित करके ) श्रीमन् ! सार्थवाह ( श्रेष्ठ व्यापारी ) रेभिल का आवास ( घर ) जानते हो ?
**चेट—**और क्या ?
**शर्विलक —**तो प्रिया ( मदनिका ) को वहाँ पहुँचा दो ।
**चेट —**आपकी जो आज्ञा ।
**मदनिका—**जैसा आप कहते हैं, आर्यपुत्र आप को सावधान रहना चाहिये । ( इस प्रकार निकल जाती है । )
**अन्वयः—**उदयनस्य, राज्ञः, यौगन्धरायणः, इव, सुहृदः, परिमोक्षणाय, ( अहम् ), ज्ञातीन्, विटान्, स्वभुजविक्रमलब्धवर्णान्, राजापमानकुपितान्, नरेन्द्र-भृत्यान्, च, उत्तेजयामि ॥ २६ ॥

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