मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १७० | मृच्छकटिकम् |
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शब्दार्थ —उदयनस्य=उदयन=वत्सराज, राज्ञः=राजा के ( छुड़ाने के लिये ), योगन्धरायण=यौगन्धरायण ( नामक महामात्य ) के, इव=समान, सुहृदः=मित्र आर्यक की, परिक्षोक्षणाय=मुक्ति के लिये ( अहम्=मैं शर्विलक ), ज्ञातीन्=कुल के बन्धु बान्धवों, विटान्=विटों, धूतों को, स्वभुजविक्रमलब्धवर्णान्=अपनी बाहुओं के पराक्रम से यश प्राप्त करने वालों को, च=और, राजापमानकुपितान्=राजा द्वारा किये गये अपमान से क्रुद्ध, नरेन्द्रभृत्यान्=राजा के कर्मचारियों को, उत्तेजयामि=उत्तेजित करता हूँ, राजा के विरुद्ध तैयार करता हूँ, उकसाता हूँ ।। २६ ।।
अर्थ—शर्विलक —मैं इस समय --
उदयन ( वत्सराज ) नामक राजा की ( मुक्ति के लिये ) यौगन्धरायण ( उनके महामात्य ) के समान ( मैं शर्विलक ) मित्र आर्यक को छुड़ाने के लिये ( राजा पालक के ) बन्धुओं, अपनी भुजाओं के पराक्रम से यश प्राप्त करने वालों, और राजा द्वारा किये गये अपमान से क्रुद्ध कर्मचारियों को ( राजा के विरुद्ध ) उत्तेजित करता हूँ, उकसाता हूँ ।। २६ ।।
टीका—सुहृद्बन्धनमाकर्ण्य शर्विलकस्तन्मोक्षोपायं निर्धारयन्नाह--ज्ञातीनिति । उदयनस्य=उदयनेति नाम्ना प्रसिद्धस्य, राज्ञः=नृपस्य, वत्सराजस्येत्यर्थः, (मोक्षणाय) योगन्धरायणः=तन्नाम्ना प्रसिद्धः प्रधानामात्यः, इव, सुहृदः=मित्रस्य, आर्यकस्येत्यर्थः, परिक्षोक्षणाय = कारागारात् मोचनार्थम्, ज्ञातीन् = बान्धवान्, विटान्=धूर्तान्, स्वभुजविक्रमलब्धवर्णान्=निजबाहूनां पराक्रमेण लब्धः=प्राप्तः, वर्णः=यशः यैस्तान् 'वर्णो द्विजातिशुक्लादियशोगुणकथासु चे'त्यमरः; अथवा स्वभुजविक्रमेण=स्वबाहु-विक्रमप्रकाशेन, लब्धवर्णान्=विचक्षणान् 'लब्धवर्णो विचक्षणः' इत्यमरः, राजाप-मानकुपितान्=राज्ञः पालकस्य अवमानेन क्रुद्धान्, कर्तरि षष्ठी, पालककृतावज्ञया क्रोधयुतान्, नरेन्द्रभृत्यान्=राजपुरुषान्, च, उत्तेजयामि=प्रोत्साहयामि, राज्ञः पाल-कस्य विनाशाय प्रेरयामीति भावः । अत्रोपमालङ्कारः । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥२६॥
विमर्श—पुराणों में यह कथा है कि वत्सराज उदयन को उज्जयिनी के राजा चन्द्रसेन ने कारागार में बन्द कर दिया था । तब उदयन के महामात्य यौगन्धरायण ने अपने बुद्धिकौशल से प्रजा में विद्रोह उत्पन्न कराकर अपने राजा उदयन को मुक्त कराया था । शर्विलक भी अपने मित्र और भावी राजा पालक की मुक्ति इसी प्रकार कराना चाहता है । 'सगोत्रबान्धवज्ञातिबन्धु —स्वस्वजनाः स्मृताः' अमरकोश ।' 'वर्णो द्विजातिशुक्लादियशोगुणकथासु च' मेदिनीकोश । उत्तेजयामि-उत्पूर्वक√तिज निशाने' चौरादिक धातु ॥ २६ ॥