भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 349

२६२ मृच्छकटिकम्

मदनिका—तेण हि तुमं इमस्सिं कामदेवगेहे मुहुत्तअं चिट्ठ, जाव अज्जआए तुह आगमणं णिवेदेमि। (तेन हि त्वमस्मिन् कामदेवगेहे मुहूर्तकं तिष्ठ, यावदार्यायै तवागमनं निवेदयामि।)

शर्विलकः—एवं भवतु।

मदनिका—(उपसृत्य) अज्जए! एसो क्खु चारुदत्तस्स सकासादो बह्मणो आअदो। (आर्ये! एष खलु चारुदत्तस्य सकाशात् ब्राह्मणः आगतः।)

वसन्तसेना—हञ्जे! तस्स केरअं त्ति कथं तुमं जाणासि? (हञ्जे! तस्य सम्बन्धीति कथं त्वं जानासि?)

मदनिका—अज्जए! अत्तणकेरअं वि ण जानामि?। (आय्ये! आत्म-सम्बन्धिनमपि न जानामि?)

वसन्तसेना—(स्वगतं। सशिरःकम्पं विहस्य) जुज्जदि। (प्रकाशम्) पविसदु। (युज्यते। प्रविशतु)


टीका—मदनिकया पुनः प्रदर्शितस्य उपायस्य महत्त्वं स्वीकुर्वन् शर्विलकः तामेव प्रशंसन्नाह-मयेति। भवतीम्=मदनिकाम्, अनुगच्छता=अनुसरता सता, मया=शर्विलकेन, महती=उत्कृष्टा, बुद्धिः=ज्ञानम्, चातुर्यं वा, आप्ता=प्राप्ता; नष्ट-चन्द्रायाम्=लुप्तचन्द्रायाम् निशायाम्=रजन्याम्, मार्गदर्शकः=सत्पथप्रदर्शकः, दुर्लभः=दुष्प्रापः, भवति। अत्र भाग्यवशात् भवती मम मार्गदर्शिका जातेति भावः। अत्र वैधम्र्येण साम्यस्य गम्यतया दृष्टान्तालङ्कार इति बोध्यम्। अर्थान्तरन्यास इत्यपि केचित्। पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २१ ॥

विमर्श—यहाँ मदनिका के बुद्धिकौशल की प्रशंसा करता हुआ शर्विलक उसे अपनी ओर और अधिक आकृष्ट करना चाहता है ॥ २१ ॥

अर्थमदनिका—इस लिये तुम इस कामदेवगृह में कुछ देर के लिये ठहरो। तब तक मैं तुम्हारे आगमन की सूचना आर्या [वसन्ततिलका] को दे आती हूँ।

शर्विलक—ऐसा ही हो।

मदनिका—[वसन्तसेना के] (पास जाकर) आर्ये! आर्य चारुदत्त के पास से यह ब्राह्मण आया है।

वसन्तसेना—सखि! तुम कैसे जानती हो कि उन [आर्य चारुदत्त] का सम्बन्धी है?

मदनिका—आर्ये! अपने सम्बन्धीजन को भी नहीं पहचानूँगी?

वसन्तसेना—[अपने में, सिर हिलाकर हँसती हुई] ठीक है। (प्रकटरूप से) उन्हें आने दो।