मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः <span style="float: right;">२६१</span>
मदनिका—तस्स ज्जेव अज्जस्स केरओ भविअ एदं अलङ्कारं अज्ज-आए उवणेहि। (तस्यैव आर्य्यस्य सम्बन्धी भूत्वा एतमलङ्कारमार्य्याया उपनय।)
शर्विलकः—एवं कृते किं भवति ?
मदनिका—तुमं दाव अचोरो, सो वि अज्जो अऋणो, अज्जआए सकं अलङ्कारं उवगदं भोदि। (त्वं तावदचौरः, सोऽपि आर्य्यः अनृणः, आर्य्यायाः स्वकः अलङ्कारक उपगतो भवति।)
शर्विलकः—ननु ! अतिसाहसमेतत्।
मदनिका—अइ ! उवणेहि। अण्णधा अदिसाहसं। (अयि ! उपनय। अन्यथा अतिसाहसम्।)
वसन्तसेना—साहु मदणिए ! साहु। अभुजिस्सए विअ मन्तिदं। (साधु, मदनिके ! साधु ! अभुजिष्ययेव मन्त्रितम्।)
शर्विलकः—
मयाप्ता महती बुद्धिर्भवतीमनुगच्छता।
निशायां नष्टचन्द्रायां दुर्लभो मार्गदर्शकः ॥ २१ ॥
मदनिका—उन आर्य चारुदत्त का ही सम्बन्धी बनकर इस अलंकार-समुदाय को आर्या [वसन्तसेना] के पास ले जाओ।
शर्विलक—ऐसा करने पर क्या होगा ?
मदनिका—पहली बात, तुम चोर नहीं रहोगे, [दूसरी बात] वे आर्य भी उऋण [धरोहर वापस करने वाले] हो जायेंगे और [तीसरी बात] आर्या बसन्तसेना को अपने आभूषण प्राप्त हो जायेगें।
शर्विलक—यह तो अतिदुःसाहस होगा।
मदनिका—अरे ले जाओ। अन्यथा [न ले जाने पर ही] अतिदुःसाहस [की बात] है।
वसन्तसेना—वाह मदनिके ! वाह ! विवाहिता स्त्री के समान सलाह दी है।
अन्वयः—भवतीम्, अनुगच्छता, मया, महती, बुद्धिः, आप्ता, नष्टचन्द्रायाम्, निशायाम्, मार्गदर्शकः, दुर्लभः [भवति] ॥ २१ ॥
शब्दार्थ—भवतीम्=आप मदनिका का, अनुगच्छता=अनुसरण करते हुये, मया=मुझ शर्विलक ने, महती=बड़ी, बुद्धिः=बुद्धि, सूझबूझ, आप्ता=प्राप्त कर ली है; नष्टचन्द्रायाम्=चन्द्रमा से रहित, निशायाम्=रात में, मार्गदर्शकः=राह दिखाने वाला, दुर्लभः=मिलना कठिन [होता] है ॥ २१ ॥
अर्थ—तुम्हारा अनुसरण करते हुये मुझ शर्विलक ने बहुत बड़ी बुद्धि=सूझ बूझ प्राप्त की है। चन्द्रमा [के प्रकाश] से रहित रात में राह दिखाने वाला कष्ट से प्राप्त होता है ॥ २१ ॥