भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

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२६६ मृच्छकटिकम्

चेटः—अज्जए ! सज्जं पवहणं । ( आर्ये ! सज्जं प्रवहणम् । )

वसन्तसेना—हञ्जे मदणिए ! सुंदिदठं मं करेहि । दिण्णासि । आरोह पवहणं । सुमरेसि मं । ( हञ्जे मदनिके ! सुदृष्टां मां कुरु । दत्ताऽसि । आरोह प्रवहणम् । स्मरसि माम् । )

मदनिका—( रुदती ) परिच्चत्तेम्हि अज्जआए । ( परित्यक्ताऽस्मि आर्य्यया । ) ( इति पादयोः पतति । )

वसन्तसेना—सम्पदं तुमं ज्जेव वन्दणीआ संवुत्ता । ता गच्छ, आरोह पवहणं । सुमरेसि मं । ( साम्प्रतं त्वमेव वन्दनीया संवृत्ता । तद् गच्छ, आरोह प्रवहणम्, स्मरसि माम् )

शर्विलकः—स्वस्ति भवत्यै । मदनिके !

सुदृष्टः क्रियतामेष शिरसा वन्द्यतां जनः ।
यत्र ते दुर्लभं प्राप्तं वधूशब्दावगुण्ठनम् ॥ २४ ॥


चेट—आर्ये ! गाड़ी तैयार है ।

वसन्तसेना—सखी मदनिके ! मुझे अच्छी प्रकार देख लेने दो । तुम ( शर्विलक को ) समर्पित की जा चुकी हो । गाड़ी पर सवार हो जाओ । मुझे याद रखना ।

मदनिका—( रोती हुई ) आपने मुझे छोड़ दिया । ( इस प्रकार पैरों पर गिर पड़ती है । )

वसन्तसेना—इस समय तुम्हीं पूजनीया हो गई हो । अतः जाओ, गाड़ी पर सवार हो जाओ । मुझे याद रखना ।

शर्विलक—( वसन्तसेना जी ! ) आप का कल्याण हो ।

अन्वयः—मदनिके !, एषः, जनः, सुदृष्टः, क्रियताम्, ( तथा ) शिरसा, वन्द्यताम्; यत्र, ते, दुर्लभम्, वधूशब्दावगुण्ठनम्, प्राप्तम् ॥ २४ ॥

शब्दार्थ—मदनिके ! एषः=यह ( वसन्तसेना ), जनः=व्यक्ति, सुदृष्टः=अच्छी प्रकार देखा गया, क्रियताम्=कर दिया जाय, ( तथा=और ) शिरसा=मस्तक से, वन्द्यताम्=बन्दना की जाय अर्थात् इनका दर्शन अच्छी प्रकार से करो और इन्हें शिर झुका कर प्रणाम करो । यत्र=जिसके कारण अथवा जिसके अनुकम्पायुक्त होने पर, ते=तुमको, दुर्लभम्=दुर्लभ, वधूशब्दावगुण्ठनम्=वधू-विवाहित स्त्री शब्दरूपी घूंघट, प्राप्तम्=प्राप्त हो सका ॥ २४ ॥

अर्थ—मदनिके ! इन [ वसन्तसेना जी ] का दर्शन अच्छी प्रकार से करो ( और ) शिर से प्रणाम करो । इनके कारण [ अथवा इनके अनुकम्पायुक्त होने पर ही ] तुमको दुर्लभ वधू (विवाहित स्त्री)-शब्दरूपी घूंघट प्राप्त हो सका ॥२४॥

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