भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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चतुर्थोऽङ्कः २६५

वसन्तसेना---को एत्थ पवहणिओ । ( कोऽत्र प्रवहणिकः ? ) ( प्रविश्य सप्रवहणः )

तमम्, न, [ भवति ], उडुपेन, शम्भोः, अलङ्घ्यम्, उत्तमाङ्गम्, गुणप्रकर्षात्,
लङ्घितम् ॥ २३ ॥

**शब्दार्थः---**पुरुषेण=पुरुष के द्वारा, गुणेषु=दयादाक्षिण्य आदि गुणों के विषय में, यत्नः=प्रयास, कायः=किया जाना चाहिये, ( पुरुष को गुणों के विषय में प्रयास करना चाहिये । ) गुणानाम्=दया दाक्षिण्यादि गुणों को, किञ्चित्=कुछ, अपि=भी, वस्तु, अप्राप्यतमम्=दुर्लभ, ( प्राप्त करना कठिन ), न=नहीं, ( भवति=होती है ), उडुपेन=चन्द्रमा ने, शम्भोः=शंकर के, अलङ्घ्यम्=न उल्लङ्घनयोग्य, उत्तमाङ्गम्=मस्तक को, गुणप्रकर्षात्=गुणों के अतिशय ( महत्त्व ) के कारण, लङ्घितम्=लांघ लिया, उसके ऊपर स्थित हो गया ॥ २३ ॥

**अर्थ---**और भी,

पुरुष को ( दया दाक्षिण्यादि ) गुणों के विषय में प्रयास करना चाहिये, क्योंकि गुणों को कोई भी वस्तु प्राप्त करना कठिन नहीं है, चन्द्रमा ने शंकर के अलंघनीय मस्तक को गुणों के प्रकर्ष के कारण ही लांघ लिया, अर्थात् उसके ऊपर स्थित हो गया ॥ २३ ॥

**टीका---**चारुदत्तस्य गुणवत्तामेव प्रदर्शयन्नाह -गुणेष्विति । पुरुषेण=जनेन, गुणेषु=दयादाक्षिण्यादिषु, विषयसप्तमी चैषा, यत्नः=प्रयासः, कार्यः=करणीयः, गुणानाम्=दया-दाक्षिण्यादीनाम्, कर्तरि षष्ठीति बोध्यम्, किञ्चित् अपि=किमपि वस्तु, अप्राप्यतमम्=अतिदुष्प्रापम् न=नैव, ( भवति=विद्यते ) ; उडुपेन=तारापतिना, चन्द्रेणेत्यर्थः, कर्तरि तृतीया, शम्भोः=शङ्करस्य, अलङ्घ्यम्=केनापि अलङ्घनीयम् उत्तमाङ्गम् = 'उत्तमाङ्गं शिरः शीर्षम् इत्यमरः गुणप्रकर्षात् = गुणातिशयादेव, लङ्घितम् = उल्लङ्घ्य तदुपरि स्थितमिति भावः । अस्मिन् श्लोके तुणप्रकर्षात् चन्द्रकर्तृकशिरोलंघनरूपेण विशेषेण गुणवतः पुरुषस्य सकलकार्यक्षमत्वरूपस्य सामान्यस्य समर्थनात् विशेषेण सामान्यस्य समर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासोऽलङ्कारः । उपेन्द्रवज्रा वृत्तम् ॥ २३ ॥

**विमर्श---**भगवान् शंकर सर्वोपरि हैं। उनके अंगों में मस्तक सर्वोपरि है। किन्तु चन्द्रमा उस मस्तक के भी ऊपर बैठा है। इसमें चन्द्रमा के गुणों का प्रकर्ष ही कारण है। अतः गुणीजन की श्रेष्ठता स्पष्ट है। यहाँ विशेष के द्वारा सामान्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है ॥ २३ ॥

अर्थ---
**वसन्तसेना---**यहाँ कोई गाड़ीवान है ?
( गाड़ी के साथ प्रवेश करके )

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