मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः २६७
( इति मदनिकया सह प्रवहणमारुह्य गन्तुं प्रवृत्तः । )
( नेपथ्ये ) कः कोऽत्र भोः ! राष्ट्रियः समाज्ञापयति—'एष खलु आर्य्यको गोपालदारको राजा भविष्यती'ति सिद्धादेशप्रत्ययपरित्रस्तेन पालकेन राज्ञा घोषादानीय घोरे बन्धनागारे बद्धः। ततः स्वेषु स्वेषु स्थानेषु अप्रमत्तैर्भवद्भिर्भवितव्यम्।
टीका—वसन्तसेनायाः अनुकम्पातः प्राप्ताभीष्टः शर्विलकः तां प्रति कृतज्ञत्वं विज्ञापयितुं मदनिकामादिशन्नाह—सुदृष्ट इति। मदनिके ! एषः=पुरः स्थितः, जनः=वसन्तसेनारूपः, सुदृष्टः = शोभनावलोकितः, क्रियताम्=विधीयताम्; तथा, शिरसा = मस्तकेन, मस्तकमनमनपूर्वमित्यर्थः, वन्द्यताम् = अभिवाद्यताम्। यत्र=अस्मिन् जने अनुकम्पमाने सति, हेतौ आधारविवक्षायां वा सप्तमी बोध्या, ते=तव ( कर्त्तरि षष्ठी ), मदनिकायाः इत्यर्थः, दुर्लभम्=वेश्यादासीत्वेन दुर्लभम्, वधूशब्दावगुण्ठनम् = वधूशब्दवाच्यरूपम् एव अवगुण्ठनम् = आवरणम्, वधूशब्देन सह अवगुण्ठनम् वधूशब्दः अवगुण्ठनञ्चैतद् द्वयमित्यभिप्रायः। एवञ्च ते सामाजिकी प्रतिष्ठा सञ्जातेति कृतज्ञतां दर्शयेति भावः। अत्र पूर्वार्द्धगतवाक्यार्थं प्रति परार्द्धगतवाक्यार्थस्य हेतुतया काव्यलिङ्गमलङ्कारः। पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २४ ॥
विमर्श—सामान्यरूप से दासीत्व से मुक्ति पाना कठिन है और उस पर भी वधू=विवाहित पत्नी का पद प्राप्त करना और भी कठिन है। परन्तु वसन्तसेना की कृपा से यह सम्भव हो सका है। अतः उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना अत्यन्त आवश्यक है। वधू बन जाने के बाद वेश्या वसन्तसेना के घर आना समाजविरुद्ध है। अतः उस उपकारिका का भलीभाँति दर्शन और प्रणाम करने के लिये शर्विलक का कहना सर्वथा उचित है। पूर्व के वाक्यार्थ के प्रति उत्तरार्ध वाक्यार्थ हेतु है। अतः काव्यलिङ्ग अलंकार और पथ्यावक्र छन्द है ॥ २४ ॥
( इस प्रकार मदनिका के साथ गाड़ी पर चढ़ कर चलने लगता है । )
अर्थ ( नेपथ्य में ) अरे यहाँ कौन कौन है ? राष्ट्रिय ( राजा का शाला शकार अथवा राजपुरुष) यह सूचित करते हैं—'यह गोपालदारक (अहीर का लड़का) राजा होगा'—इस प्रकार के किसी सिद्ध पुरुष के वचन पर विश्वास करने से घबड़ाये हुये राजा पालक ने घोष ( अहीरों की वस्ती ) से लाकर कठोर जेलखाने में बन्द कर रखा है। इस लिये सभी ( पहरेदारों ) को अपने अपने स्थानों पर सावधान हो जाना चाहिये।
टीका—राष्ट्रियः = राजश्यालकः अथवा राष्ट्ररक्षायां नियुक्तोऽधिकारी। 'राष्ट्रावारपाराद्घखौ' इति घ-प्रत्ययः। गोपालस्य=आभीरकस्य, दारकः=पुत्रः, सिद्धस्य=सिद्धिम्रत ऋषेः, आदेशे=कथने, भविष्यद्वाण्यामिति भावः, यः प्रत्ययः=