मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः २७३
दन्ति-दन्ततोरणावभासिदस्स, महारअणोवराओवसोहिणा पवणबलन्दोलणा-ललन्तचञ्चलगृहत्थेण, 'इदो एहि' त्ति वाहरन्तेण विअ मं सोहग्गपड़ा-आणिवहेणोवसोहिदस्स, तोरणधरणत्थम्भवेदिआ-णिक्खित्त-समुल्लसन्त-हरिदचूदपल्लवललामफटिअ-मङ्गल-कलसाहिरामोभयपासस्स, महासुरवक्खत्थलदुब्भेज्जवज्जणिरन्तरपडिवद्धकण अकवाड़स्स, दुग्गदजणमणोरहाआसकरस्स, वसन्तसेणा-भवण-दुआरस्स सस्सिरीअदा । जं सच्चं मज्झत्थस्स वि जणस्स वलादिट्ठिं आआरेदि । ( अहो ! सलिल-सिक्त-मार्जित-कृत-हरितोपलेपनस्य, विविध-सुगन्धिकुसुमोपहार-चित्रलिखितभूमि-
शब्दार्थ—सलिलसिक्त-मार्जित-कृत-हरितोपलेपनस्य = पानी से सींचकर = छिड़क कर, झाड़ू से साफ कर गोबर से लीपे गये, विविध-सुगन्धि-कुसुमोपहार-चित्रलिखित-भूमिभागस्य = विभिन्न प्रकार के सुगन्धित फूलों की रचनाओं से चित्रयुक्त भूमिभागवाले, गगनतलावलोकन-कौतूहल-दूरोन्नमितशीर्षस्य = आकाश को देखने की उत्सुकता से बहुत ऊँचाई तक शिर को उठाने वाले, दोलायमानाव लम्बितैरावण-हस्तभ्रमायित-मल्लिकादाम-गुणालङ्कृतस्य = हिलने वाली, लटकने वाली, ऐरावत हाथी सूँड़ के भ्रम को पैदा करने वाली मल्लिका के फूल की मालाओं से सजे हुए, समुच्छ्रित-दन्ति-दन्त-तोरणावभासितस्य = बहुत ऊँचे, हाथी दाँत के तोरण से सुशोभित, महारत्नोपरागशोभिना = बड़े बड़े रत्नों के उपराग = रंग से शोभायुक्त, पवनबलान्दोलनाललच्चञ्चलाग्रहस्तेन = हवा के झोंको से हिलने से कम्पमान एवं चञ्चल अग्रभागरूपी हाथ से, इतः = इधर, एहि = आइये, इति = इस प्रकार, माम् = मुझको, व्याहरता = बुलाते हुये, इव = से, सौभाग्यपताकानिवहेन = मङ्गलसूचक पताकाओं के समूह से, उपशोभितस्य = सुशोभित, तोरण-धरण-स्तम्भवेदिका-निक्षिप्तसमुल्लसद्धरित-चूतपल्लव-ललाम-स्फटिकमङ्गल-कलसाभिरामोभयपार्श्वस्य = बाहरी दरवाजों को धारण करने के लिये बनाये खम्भों की चौकियों पर रखे गये, सुन्दर हरे आम के पत्तों से शोभायमान, स्फटिकमणियोँ के मङ्गल कलसों से शोभित दोनों भाग वाले, महासुर-वक्षःस्थल-दुर्भैद्य-वज्र-निरन्तर-प्रतिवद्ध-कनक-कपाटस्य = महान् असुर = हिरण्यकशिपु की छाती के समान दुर्भेद्य = फाड़ने में कठिन तथा वज्र = हीरा की कीलों से जटित सोने के किवाड़ों वाले, दुर्गंतजन-मनोरथायासकरस्य = निर्धन लोगों की अभिलाषा का परिश्रम कराने वाले, वसन्तसेना-द्वारस्य = वसन्तसेना के दरवाजे की, सश्रीकता = सुन्दरता = सम्पन्नता । मध्यस्थस्य = उदासीन की, आकारयति = खींच लेता है !
अर्थ—विदूषक—( देखकर आश्चर्यचकित होकर ) अहो ! जहाँ पानी छिड़क कर, झाडू लगा कर गोबर से लीपा गया है; जहाँ का भूमिभाग विभिन्न
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