भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२७४मृच्छकटिकम्

भागस्य, गगनतलावलोकन-कौतूहलदूरोन्नामितशीर्षस्य, दोलायमानाव लम्बितै रावण-हस्त-भ्रमयित-मल्लिकादामगुणालङ्कृतस्य, समुच्छ्रित-दन्तिदन्ततोरणावभासितस्य, महारत्नोपरागशोभिना पवनबलान्दोलना-ललच्चञ्चलाग्रहस्तेन 'इत एहि' इति व्याहरतेव मां सौभाग्यपताकानिवहेनोपशोभितस्य, तोरणधरणस्तम्भवेदिका-निक्षिप्तसमुल्लसद्धरित- — चूतपल्लवलालामस्फटिकमङ्गलकलसाभिरामोभयपार्श्वस्य, महासुर-वक्षः-स्थल-दुर्भेद्य-वज्र-निरन्तरप्रतिबद्ध-कनक-कपाटस्य दुर्गतजन-मनोरथायासकरस्य, वसन्तसेनाभवनद्वारस्य सश्रीकता । यत् सत्यं मध्यस्थस्यापि जनस्य बलाद्दृष्टिमाकारयति । )

प्रकार के पुष्पों के चढ़ाने से चित्र में चित्रित सा लग रहा है; आकाश की सुन्दरता देखने की उत्सुकता के कारण जिसने अपने शिर ( ऊपरी भाग ) को बहुत ऊँचा उठा रखा है, जो हिलती हुई एवं लटकती हुई तथा ऐरावत हाथी की सूँड़ के भ्रम को उत्पन्न कराने वाली 'मल्लिका=जूही' के फूलों की माला से शोभित है; जो हाथी के दाँतो से बने हुये, बहुत ऊँचे तोरणों से शोभायमान है; मूल्यवान् विशाल रत्नों के सम्पर्क से अच्छे लगने वाले, हवा के झोंकों से हिलने के कारण कांपते हुये एवं चञ्चल अग्रभागरूपी हाथ से, 'इधर आइये' इस प्रकार मुझें पुकारते हुये से, मंगलसूचक पताका-समुदाय से जो शोभित हो रहा है; तोरण ( बाहरी दरवाजा ) को धारण करने के लिये बनाये गये खम्भों की चौकियों पर रक्खे हुये, लहलहाते हरे आम के पत्तों से सुन्दर, स्फटिकमणि से बने हुये मंगल-कलसों से जिसकी दोनों बगलें ( ओर ) आकर्षक लग रहीं हैं, 'हिरण्यकशिपु' की छाती के समान दुर्भेदनीय तथा हीरे की बनी हुई कीलों से जड़े हुये सोने के किवाड़ जिसमें लगे हुये हैं, निर्धन लोगों के मनोरथों को पीडित करने वाले, अहो ! वसन्तसेना के भवन के दरवाजे की सुन्दरता ( दर्शनीय ) है । यह सच में निस्पृह लोगों की भी दृष्टि को बलपूर्वक अपनी ओर खींच लेता है ।

टीका—**पूर्वम्=**प्रथमम्, **सलिलेन=**जलेन, **सिक्तम्=**आर्द्रकृतम्, ततः मार्जितम्= मार्जन्या **स्वच्छीकृतम्, शोधितम्, ततः कृतम्=**विहितम्, **हरितेन=**गोमयादिना द्रव्येण **उपलेपनम्=**प्रलेपनं यत्र तादृशस्य ( षष्ठ्यन्तानि सर्वाणि पदानि वसन्तसेना-भवनद्वारस्य विशेषणानीति बोध्यम् । ), **विविधानाम्=**विभिन्नानाम् सुगन्धीनाम्= गन्धयुक्तानाम्, **कुसुमानाम्=**पुष्पाणाम् **उपहारैः=**रचनाविशेषैः, चित्रलिखित इव= आलेख्यप्रदर्शित इव **भूमिभागः=**भूस्थलं यस्मिन् तस्य तादृशस्य, गगनतलस्य= आकाशस्य, **अवलोकनाय=**विलोकनाय, **यत् कौतूहलम्=**औत्सुक्यम्, तेन दूरम्= दूरपर्यन्तम्, **उपरिभागे इत्यर्थः, उन्नामितम्=**उत्थापितम्, **शीर्षम्=**शिरः, येन तस्य, दोलायमानः = वायुसम्पर्केण कम्पमानः, तथा अवलम्बितः = अधोलम्बितः, तथा