मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 379, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः २९१
चेटी-- हदास ! मरिस्ससि । ( हताश ! मरिष्यसि । )
विदूषकः-- (सपरिहासम्) दासीए धोए ! वरं ईदिसो सून-पीण-जठरो मुदो ज्जेव । ( दास्याः पुत्रि ! वरम् ईदृशः शूनपीनजठरो मृत एव । )
सीहु-सुरासव-मत्तिआ एआवत्थ गदा हि अत्तिआ ।
जइ मरइ एत्थ अत्तिआ भोदि सिआल-सहस्स-जत्तिआ ॥ ३० ॥
( सीधुसुरासवमत्ता एतावदवस्थां गता हि माता ।
यदि म्रियतेऽत्र माता भवति शृगालसहस्रयात्रा ॥ ३० ॥ )
भोदि ! किं तुम्हाणं जाणवत्ता वहन्ति ? (भवति ! किं युष्माकं यानपात्राणि वहन्ति ? )
**चेटी--**मूर्ख ! मारे जाओगे ।
विदूषक-- ( हँसी से ) दासी की बच्ची ! बढ़े हुये और मोटे पेटवाला व्यक्ति मरा हुआ ही अच्छा है ।
**अन्वयः--**सीधुसुरासवमत्ता, माता, एतदवस्थाम्, गता, हि, अत्र, यदि, माता, म्रियते, शृगालसहस्रयात्रा, भवति ॥ ३० ॥
**शब्दार्थ--**सीधुसुरासवमत्ता=सीधु, सुरा और आसव [ इन तीन प्रकार की मदिराओं ] से मत्त, माता = वसन्तसेना की माँ, एतावदवस्थाम्=इस प्रकार की मोटापा की दशा को, गता=प्राप्त कर चुकी है, हि=निश्चित, यदि=यदि, माता=माता, म्रियते=मर जाती है, तो, शृगालसहस्रयात्रा=हजारों सियारों की जीवन-यात्रा=भोजन, भवति=हो जाये ॥ ३० ॥
**अर्थ--**सीधु, सुरा और आसव —इन तीन प्रकार की मदिराओं के पीने से मतवाली यह माता इस [ मोटापा की ] हालत को प्राप्त हुयी हैं, यदि ये माता मर जाती हैं तो हजारों सियारों की यात्रा=जीवनयात्रा=भोजन बन जायगी ॥ ३० ॥
**टीका--**वसन्तसेनायाः मातुः स्थौल्यं विलोक्य जीवनापेक्षया तस्य मरणमुप-कारकमिति प्रतिपादयति —सीधुसुरेति । सीधु-सुरासवैः = त्रिविधैः मदिराविशेषैः, तासां भृशं पानेनेत्यर्थः, मत्ता=मदयुक्ता, माता=वसन्तसेनायाः माता, एतावदवस्थाम्=एतादृशीं स्थूलावस्थाम्, गता=प्राप्ता, माता, यदि, म्रियते=निधनं प्राप्नोति, तदा, शृगालसहस्राणाम्, यात्रा=जीवनयात्रा, भोजनमिति भावः, भवति=सम्पद्यते । एवञ्च जीवनान् मरणं श्रेयः । आर्या वृत्तम् ॥ ३० ॥
**विमर्श--**अन्न, फल आदि से बननेवाली तीनों मदिराओं को यहाँ लिखा है । शृगालसहस्रयात्रा-के स्थान पर कहीं-कहीं 'शृगालसहस्रपर्याप्तिका' यह पाठ है । अभिप्राय समान है ॥ ३० ॥
**अर्थ--**आर्ये ! क्या [ व्यापारादि के लिये ] आप लोगों की गाड़ियाँ चलती हैं ?