भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२९० || मृच्छकटिकम्

भवति ! एषा पुनः का फुल्लप्रावारकप्रावृता उपानद्युगलक्षिप्त-तैल-चिक्कणाभ्यां पादाभ्यामुच्चासनोपविष्टा तिष्ठति ? )

चेटी—अज्ज ! एसा क्खु अम्हाणं अज्जआए अत्तिआ । ( आर्ये ! एषा खल्वस्माकम् आर्याया माता । )

विदूषकः—अहो ! से अपवितडाइणीए पोट्टवित्थारो ता किं एदं पवेसिअ महादेवं विअ दुआरसोहा इह घरे णिम्मिदा ? । ( अहो ! अपवित्रडाकिन्या उदरविस्तारः । तत् किम् एतां प्रवेश्य महादेवमिव द्वारशोभा इह गृहे निर्मिता ? )

चेटी—हदास ! मा एव्वं उवहस अम्हाणं अतिअं । एसा क्खु चाउत्थिएण पीडिअदि । ( हताश ! मैवमुपहस अस्माकं मातरम् । एषा खलु चातुर्थिकेन पीड्यते । )

विदूषकः—( सपरिहासम् ) भववं चाउत्थिअ ! एदिणा ऊवआरेण मं वि वम्हणं आलोएहि । ( भगवन् चातुर्थिक ! एतेनोपकारेण मामपि ब्राह्मणमालोकय । )


शब्दार्थफुल्लप्रावारकवृता=फूले हुये या फूलों की आकृति से युक्त कढ़ाई वाली चादर ओढ़े हुये, उपानद्-युगल-निक्षिप्त-तैल-चिक्कणाभ्याम्=दोनों जूतियों में डाले गये तेल से चिकने, पादाभ्याम् = पैरों से । आर्यायाः=वसन्तसेना की । अपवित्रडाकिन्याः = अपवित्र डाइन का, कहीं कहीं कपर्दडाकिन्याः = दूषित डाइन का -- यह पाठ है । हताश=मूर्ख । प्रवेश्य=प्रवेश कराकर । चातुर्थिकेन=चौथिया, चार चार दिन पर होने वाले बुखार से । शूनपीनजठरः=बढ़े एवं मोटे पेटवाला ।

अर्थ—( दूसरी ओर देखकर ) श्रीमती जी ! यह कौन है जो फूलोंवाली चादर ओढ़े हुये, दोनों जूतों में तेल डालने से चिकने पैरों वाली ऊँचे आसन पर बैठी है ।

चेटी—आर्ये ! ये हम लोग की आर्या ( मालकिन वसन्तसेना ) की माता जी हैं।

विदूषक—ओह ! इस गन्दी डाइन के पेट का फैलाव । तो क्या महादेव के समान इसको पहले ( घर में ) प्रवेश कराकर यहाँ घर में सुन्दर दरवाजों की शोभा बनाई गयी होगी । [ दरवाजे बन जाने के बाद इतने बड़े पेटवाली इसको घर में घुसा सकना कठिन होता । ]

चेटी—मूर्ख ! हम लोगों की माताजी की हंसी मत उड़ाओ । यह तो चौथिया बुखार से पीड़ित है ।

विदूषक—भगवन् चातुर्थिक ! इसी उपकार की दृष्टि से मुझ ब्राह्मण को भी देखिये ।