मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः
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विदूषकः— ( प्रविश्य दृष्ट्वा च ) ही ही भो ! रुक्खवाड़िआए सस्सि-रीअदा । अच्छरीदि-कुसुमपत्थारा रोविदा अणेअपाददा णिरन्तर-पाद-वतल-णिम्मिदा जुवदिजण-जहणप्पमाणा पट्टदोला, सुवण्णजूधिआ-सेहालिआ-मालई-मल्लिआ-णोमालिआ-कुरवआ-अदिमोत्तञ-प्पहुदिकुसुमेहि सयं णिवड़िदेहिं जं सच्चं लघु करेदि विअ गन्दणवणस्स सरिसरीअदं । ( अन्यतोऽवलोक्य ) इदो अ उदअन्त-सूरसमप्पहेहिं कमलरत्तोप्पलेहिं । संज्झाइदि विअ दीहिआ । ( आश्चर्यं भोः ! अहो वृक्षवाटिकायाः सश्रीकता ! अच्छरीतिकुसुमप्रस्ताराः रोपिता अनेकपादपाः, निरन्तर-पादपतल-निर्मिता युवति-जन-जघनप्रमाणा पट्टदोला, सुवर्णयूथिका-शेफालिका-मालती-मल्लिका-नवमल्लिका-कुरबकातिमुक्तकप्रभृतिकुसुमैः स्वयं निपतितैर्यत्सत्यं लघूकरोतीव नन्दनवनस्य सश्री-कताम् । इतश्च उदयत्-सूर्य-समप्रभैः कमलरक्तोत्पलैः सन्ध्यायते इव दीर्घिका । )
शब्दार्थ —सश्रीकतां=सौन्दर्यम् । अच्छरीतिकुसुमप्रस्तारा=सुन्दर ढंग से फूलों के फैलाववाले, रोपिताः=लगाये गये, निरन्तर-पादपतलनिर्मिता=घने पेड़ों के नीचे बनीं हुयीं, युवतिजनजघनप्रमाणा=युवतियों के पृष्ठ भाग=नितम्ब के समान प्रमाण-वाली, पट्टदोला=रेशम से बने हुये झूले हैं, नन्दनवनस्य=इन्द्र के उपवन को, लघू-करोतीव=मानों तुच्छ कर रहा है । उदयत्-सूर्यसमप्रभैः=उदित होनेवाले सूर्य के समान, कमलरक्तोत्पलैः = सफेद कमल और लाल कमलों से, दीर्घिका = बावड़ी, सन्ध्यायते इव=सन्ध्या के समान लग रही है ।
अर्थ—विदूषक—( प्रवेश करके और देखकर ) अरे आश्चर्य है । अहो ! इस वृक्ष वाटिका की सुन्दरता [ अपूर्व है ] ! अच्छे ढंग से फैले हुये फूलों के विस्तार वाले अनेक पेड़ लगे हैं, घने पेड़ों के नीचे बने हुये, युवतियों की जघन [ कटि अधोभाग ] के समान प्रमाणवाले, रेशमी झूले हैं। अपने आप गिरे हुये, सुवर्ण-यूथिका, शेफालिका, मालती, मल्लिका, नवमल्लिका, कुरबक, अतिमुक्तक आदि के फूलों से सचमुच इन्द्रवन की सुन्दरता को कम कर रहा है । ( दूसरी ओर देखकर ) और इधर उदित होते हुये सूर्य के समान कान्तिवाले श्वेत और लाल कमलों से यह वापी सन्ध्या के समान लग रही है । [ इस की शोभा सन्ध्याकाल के समान लग रही है । ]
टीका—अच्छरीत्या = शोभनप्रकारेण, कुसुमानाम् = पुष्पाणाम्, प्रस्तारः= विस्तारः, येषु ते तादृशाः, रोपिताः=आरोपिताः; निरन्तराः=अन्तरशून्याः सघनाः ये पादपाः=वृक्षाः तेषां तले=अधोभागे, निर्मिता=रचिता, युवतिजनानां जघनम्= कटितटाधोभागः, प्रमाणं यस्याः सा, तादृशी, पट्टस्य=क्षौमस्य, दोला=प्रेङ्खा, स्वयं निपतितैः=समयप्रवाहेण स्वयं भूमौ पतितैः, नन्दनवनस्य=इन्द्रवनस्य, सश्रीकताम्=