मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 402, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ें३१४ | मृच्छकटिकम्
**विदूषकः—**दासीए पुत्त ! दुट्ट पारावअ ! चिट्ठ चिट्ठ, जाव एदिणा दण्डकट्ठेण सुपक्कं विअ चुअफलं इमादो पासादादो भमिए पाडइस्सं । ( इति दण्डकाष्ठमुद्यम्य धावति ) दास्याः पुत्र ! दुष्ट पारावत ! तिष्ठ तिष्ठ, यावदेतेन दण्डकाष्ठेन सुपक्वमिव चूतफलम् अस्मात् प्रासादात् भूमौ पातयिष्यामि ।)
चारुदत्तः—( यज्ञोपवीते आकृष्य ) वयस्य ! उपविश । किमनेन । तिष्ठतु दयितासहितस्तपस्त्री पारावतः ।
**चेटः—**कधं पारावदं पेक्खदि, मं ण पेक्खदि । भोदु, अवराए लोट्ट-गुडिआए पुणो वि ताडइस्सं । ( तथा करोति । ) कथं परावर्तं प्रेक्षते, मां न प्रेक्षते ! भवतु, अपरया लोष्टगुटिकया पुनरपि ताडयिष्यामि । )
विदूषकः—( दिशोऽवलोक्य ) कधं कुम्भीलओ ! ता जाव उपसप्पामि । ( उपसृत्य द्वारमुद्घाट्य ) अरे कुम्भीलअ ! पविश । साअदं दे । ( कथं कुम्भीलक ! तद् यावदुपसर्पामि । अरे कुम्भीलक ! प्रविश । स्वागतं ते । )
चेटः—( प्रविश्य ) अज्ज ! वन्दामि । ( आर्य ! वन्दे । )
**विदूषकः—**अरे ! कहिं तुमं ईदिसे दुद्दिणे अन्धआरे आअदो । ( अरे ! कस्मिन् त्वमीदृशे दुर्दिने अन्धकारे आगतः । )
**चेटः—**अले एशा शा । ( अरे एषा सा । )
**विदूषकः—**का एशा का ? ( का एषा का ? )
**चेटः—**एशा शा । ( एषा सा । )
**विदूषक—**अरे दासी के बच्चे, दुष्ट कबूतर ! ठहर जा, ठहर जा; इस लकड़ी के डण्डे से पके हुये आम के समान तुझे इस महल से नीचे गिराता हूँ । ( यह कह कर लकड़ी का डण्डा लेकर दौड़ता है । )
चारुदत्त -- ( जनेऊ पकड़ कर ) मित्र ! बैठो । इससे क्या लाभ ? उस बेचारे कबूतर को अपनी प्रेयसी कबूतरी के साथ बैठा रहने दो ।
**चेट—**क्या, कबूतर को देख रहा है, मुझे नहीं देख रहा है । अच्छा अब दूसरी कंकड़ी से फिर मारता हूँ । ( वैसा ही करता है । )
विदूषक— ( चारों ओर देखकर ) क्या कुम्भीलक ! तो पास चलता हूँ । ( पास जाकर दरवाजा खोलकर ) अरे कुम्भीलक ! आओ, तुम्हारा स्वागत है ।
चेट—( प्रवेश करके ) आर्य ! प्रणाम करता हूँ ।
**विदूषक—**अरे ! तुम इस प्रकार के दुर्दिन के अन्धेरे में किस लिये आये हो ?
**चेट—**अरे ! यह वह है ।
**विदूषक—**वह कौन वह कौन ?
**चेट—**वह यह है ।