भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३१६ मृच्छकटिकम्

चारुदत्तः—मूर्ख ! वसन्ते ।
विदूषक—( चेटमुपगम्य ) मुक्ख ! बसन्ते । ( मूर्ख ! वसन्ते । )
चेटः—दुदिअं दे पण्हं दइश्शं । शुशमिद्धाणं गामाणां का लक्खणं कलेदि ? । ( द्वितीयं ते प्रश्नं दास्यामि । सुसमृद्धानां ग्रामाणां का रक्षां करोति ? )
विदूषकः—अरे रच्छा । ( अरे ! रथ्या । )
चेटः—( सहासम् ) अले ! णहि णहि । ( अरे ! नहि नहि । )
विदूषकः—भोदु, संसए पड़िदम्हि । ( विचिन्त्य ) भोदु, चारुदत्तं पुणो वि पुच्छिस्सं । ( पुनर्निवृत्य चारुदत्तं तथैवोदाहरति । ) ( भवतु, संशये पतितोऽस्मि । भवतु चारुदत्तं पुनरपि प्रक्ष्यामि । )
चारुदत्तः—वयस्य ! सेना ।
विदूषकः—( चेटमुपगम्य ) अरे ! दासीए पुत्ता ! सेणा । ( अरे ! दास्याः पुत्र ! सेना । )
चेटः—अले ! दुवे बि एकक्किंश कडुआ शिग्धं भणाहि । ( अरे ! द्वे अपि एकस्मिन् कृत्वा शीघ्रं भण । )
विदूषकः—सेणावसन्ते । ( सेनावासन्ते । )
चेटः— णं पलिवत्तिअ भणाहि । ( ननु परिवर्त्य भण । )
विदूषकः ( कायेन परिवृत्य ) सेणावसन्ते । ( सेनावासन्ते । )


( चारुदत्त के पास जाकर ) हे मित्र ! मैं तुमसे पूछता हूँ किस समय आम में मञ्जरी आतीं हैं ?
चारुदत्त—मूर्ख ! वसन्त में ।
विदूषक—( चेट के पास जाकर ) मूर्ख ! वसन्त में ।
चेट—दूसरा प्रश्न देता हूँ । अत्यन्त समृद्ध गांवों की रक्षा कौन करता है ?
विदूषक—अरे ! रथ्या ( रक्षा करती है ) ।
चेट—( हँसी के साथ ) नहीं, नहीं ।
विदूषक—अरे ! संशय में फँस गया हूँ । ( सोच कर ) अच्छा, फिर चारुदत्त से पूछता हूँ । ( फिर चारुदत्त के पास जाकर उसी प्रकार पूछता है । )
चारुदत्त—मित्र ! सेना ।
विदूषक—( चेट के पास जाकर ) अरे दासी के बच्चे ! सेना ।
चेट—अरे ! दोनों को एक में मिलाकर जल्दी से कहो ।
विदूषक—सेना-वसन्त ।
चेट—अरे ! उल्टा कर कहो ।
विदूषक—( शरीर से उलट=घूमकर ) सेना-वसन्त ।