भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 405

पञ्चमोऽङ्कः ३१७

चेटः—अले मुक्ख वडुका ! पदाइं पलिवत्तावेहि । ( अरे मूर्ख वटुक ! पदे परिवर्त्तय । ) विदूषकः—(पादौ परिवर्त्त्य) सेणावसन्ते । (सेना वसन्ते ।) चेटः—अले मुक्ख ! अक्खलपदाइं पलिवत्तावेहि । ( अरे मूर्ख ! अक्षरपदे परिवर्त्तय । ) विदूषकः—(विचिन्त्य) वसन्तसेणा । (वसन्तसेना ।) चेटः—एशा शा आददा । (एषा सा आगता ।) विदूषकः—ता जाव चारुदत्तस्स णिवेदेमि । (उपसृत्य) भो चारुदत्त ! धणिओ दे आगदो । (तद् यावत् चारुदत्तस्य निवेदयामि । भो चारुदत्त ! धनिकस्ते आगतः ।) चारुदत्तः—कुतोऽस्मत्कुले धनिकः ? विदूषकः—जइ कुले णत्थि, ता दुवारे अत्थि । एसा वसन्तसेणा आगदा । (यदि कुले नास्ति, तद्द्वारे अस्ति । एषा वसन्तसेना आगता ।) चारुदत्तः—वयस्य ! कि मां प्रतारयसि ? विदूषकः—जइ मे वअणे ण पत्तिआअसि, ता एदं कुम्भीलअं पुच्छ । अरे दासीए पुत्ता ! कुम्भीलअ ! उवसप्प । (यदि मे वचने न प्रत्येषि । तत् एतत् कुम्भीलकं पृच्छ । अरे दास्याः पुत्र ! कुम्भीलक उपसर्प ! ) चेटः—(उपसृत्य) अज्ज ! वन्दामि । (आर्य ! वन्दे ।)


चेट—अरे मूर्ख ब्राह्मण ! पद बदल कर ।
विदूषक—(पैर बदल कर) सेना वसन्त ।
चेट—अरे मूर्ख ! अक्षरों के पद बदल कर ।
विदूषक—(सोचकर) वसन्तसेना ।
चेट—वह यह आयी हुई है ।
विदूषक—तो आर्य चारुदत्त से निवेदन करता हूँ । (पास जाकर) हे चारुदत्त ! आपका धनिक (साहूकार) आ गया है ।
चारुदत्त—अरे हमारे कुल में धनिक कहाँ से ?
विदूषक—यदि कुल में नहीं है तो दरवाजे पर है । यह वसन्तसेना आयी हुयी है ।
चारुदत्त—मित्र ! क्यों मुझे ठग रहे हो ?
विदूषक—यदि मेरी बात पर विश्वास नहीं करते हो तो इस कुम्भीलक से पूछो । अरे दासी के बच्चे कुम्भीलक ! इधर आओ ।
चेट—(पास जाकर) आर्य ! प्रणाम करता हूँ ।

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक) · पृष्ठ 405, कुल 760 में से · BharatKosha