मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 406, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ें३१८ | मृच्छकटिकम्
**चारुदत्तः—**भद्र ! स्वागतम् । कथय—सत्यं प्राप्ता वसन्तसेना ?
**चेटः—**एशा शा आददा वसन्तसेणा । ( एषा सा आगता वसन्तसेना । )
चारुदत्तः—(सहर्षम्) भद्र ! न कदाचित् प्रियवचनं निष्फलीकृतं मया । तद् गृह्यतां परितोषिकम् । ( इत्युत्तरीयं प्रयच्छति । )
चेटः—( गृहीत्वा प्रणम्य सपरितोषम् ) जाव अज्जआए णिवेदेमि । ( यावदार्यायै निवेदयामि । ) ( इति निष्क्रान्तः । )
**विदूषकः-**भो । अवि जाणासि; किं णिमित्तं ईदिसे दुट्ठिणे आअदेत्ति? । ( भोः ! अपि जानासि; किं निमित्तमीदृशे दुर्दिने आगतेति ? )
**चारुदत्तः—**वयस्य ! न सम्यगवधारयामि ।
**विदूषकः-**मए जाणिदं । अप्पमुल्ला रअणावलो, बहुमूलं सुवण्णभण्डअं त्ति ण परिदुट्टा अवरं मग्गिदुं आददा ( मया ज्ञातम् । अल्पमूल्या रत्नावली, बहुमूल्यं सुवर्णभाण्डकम् इति न परितुष्टा, अपरं याचितुमागता । )
चारुदत्तः—( स्वगतम् ) परितुष्टा यास्यति ।
( ततः प्रविशति उज्ज्वलाभिसारिकावेशेन वसन्तसेना सोत्कण्ठा, छत्रधारिणी विटश्च । )
विटः—( वसन्तसेनामुद्दिश्य )
अपद्मा श्रीरेषा प्रहरणमनङ्गस्य ललितं
कुलस्त्रीणां शोको मदनवरवृक्षस्य कुसुमम् ।
**चारुदत्त—**भद्र ! स्वागत है । कहो, सचमुच वसन्तसेना आयी है ?
**चेट—**हां, वह वसन्तसेना आयी हुयी है ।
चारुदत्त—( हर्ष के साथ ) भद्र ! मैंने कभी भी प्रियवचन को निष्फल नहीं किया । [ अर्थात् प्रिय बोलने वाले को खाली नहीं लोटाया ), इस लिये पुरस्कार ग्रहण करो । ( यह कह कर दुपट्टा दे देता है । )
चेट—(लेकर सन्तोष के साथ प्रणाम करके) तो चल कर आर्या (वसन्तसेना) से निवेदन करता हूँ । ( यह कर निकल जाता है । )
**विदूषक—**मित्र, जानते हो इस दुर्दिन में क्यों आयी है ?
**चारुदत्त—**मैं ठीक से नहीं समझ पा रहा हूँ ।
**विदूषक—**मैंने समझ लिया । रत्नावली कम मूल्य की है और सुवर्णभाण्ड अधिक मूल्य का है अतः वह सन्तुष्ट नहीं है, और कुछ लेने के लिये आयी है ।
चारुदत्त—( अपने आप में ) सन्तुष्ट होकर वापस जायेगी ।
( इसके बाद उज्ज्वल अभिसारिका वेश से उत्कण्ठित वसन्तसेना, छत्रधारिणी दासी और विट का प्रवेश ) ।