भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 447

पञ्चमोऽङ्कः ३५१

अपि च—

धाराभिरार्यजनचित्तसुनिर्मलाभि- श्चण्डाभिरर्जुन-शर-प्रतिकर्कशाभिः । मेघाः स्रवन्ति बलदेव-पट-प्रकाशाः शक्रस्य मौक्तिकनिधानमिवोद्गिरन्तः ॥ ४५ ॥

वियोगे सति गगनं तद्दुःखेन रोदितीत्यर्थः । अत्रोपमा, उत्प्रेक्षा समासोक्तिश्चेति बोध्यम् । उपजातिवृत्तम् ॥ ४४ ॥

विमर्श— जैसे काले कीचड़ को फाड़ कर कमल की जड़ों के श्वेत अंकुर ऊपर निकल आते हैं उसी प्रकार काले बादलों को फाड़ कर श्वेत जलविन्दुयें निकल कर गिर रहीं हैं। यहाँ 'आकाश की अश्रुधारा के समान' इसमें उत्प्रेक्षा है, उपमा नहीं क्योंकि यह अप्रसिद्ध उपमान है। आकाश का स्वामी चन्द्रमा मेघों से आवृत होकर विपत्ति में पड़ गया है। अतः आकाश उसके लिये आँसू गिरा रहा है। ऐसा व्यवहार-समारोप होने से समासोक्ति है। 'चन्द्रव्यसनं विलोक्य' यह ल्यब्लोप में पञ्चमी है ॥ ४४ ॥

अन्वयः— बलदेवपटप्रकाशाः, मेघाः, आर्यजनचित्तसुनिर्मलाभिः, अर्जुन-शरप्रतिकर्कशाभिः, चण्डाभिः, धाराभिः, शक्रस्य, मौक्तिकविधानम्, उद्गिरन्तः, इव, स्रवन्ति ॥ ४५ ॥

शब्दार्थः— बलदेवपटप्रकाशाः = बलराम के वस्त्रों के समान [ नीली ] आभा वाले, मेघाः = बादल, आर्यजनचित्तसुनिर्मलाभिः = सज्जनों के हृदय के समान निर्मल = स्वच्छ, अर्जुनशर-कर्कशाभिः = अर्जुन के बाणों के समान कठोर, चण्डाभिः = तीखी, धाराभिः = जलधाराओं के द्वारा, शक्रस्य = इन्द्र के, मौक्तिकनिधानम् = मोतियों के खजाने को, उद्गिरन्तः = बिखराते, गिराते हुये, इव = के समान, स्रवन्ति = झर रहे हैं ॥ ४५ ॥

अर्थ— [ कृष्ण के बड़े भाई ] बलराम के नीले वस्त्रों की आभा के समान आभावाले मेघ आर्यजनों के चित्त के समान स्वच्छ ( और ) अर्जुन के बाणों के समान कठोर तीखी जलधाराओं के द्वारा इन्द्र के मोतियों के खजाने को बिखेरते हुये से झर रहे हैं ॥ ४५ ॥

टीका— मेघस्य जलवर्षणप्रकारमेवाह—धारेति । बलदेवपटप्रकाशाः = बलराम-वस्त्रसदृशाः, नीला इत्यर्थः, मेघाः = जलदाः, आर्यजनानां चित्तवत् सुनिर्मलाभिः = विमलाभिः, अथ च, अर्जुनस्य = मध्यमपाण्डवस्य, शरवत्, प्रतिकर्कशाभिः = अतिकठोराभिः, अथ च, चण्डाभिः = उग्राभिः, धाराभिः = जलधाराभिः, शक्रस्य = इन्द्रस्य, मौक्तिकनिधानम् = मुक्ताकोशम्, मुक्तासमूहं वा, उद्गिरन्तः = निःसारयन्तः,

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