मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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प्रिये ! पश्य पश्य—
एतैः पिष्ट-तमाल-वर्णकनिभैरालिप्तमम्भोधरैः संसक्तैरुपजीवितं सुरभिभिः शीतैः प्रदोषानिलैः। एषाऽम्भोद-समागम-प्रणयिनी स्वच्छन्दमभ्यागता रक्ता कान्तमिवाम्बरं प्रियतमा विद्युत् समालिङ्गति ॥ ४६ ॥
विकीरन्तः वा, इव, स्रवन्ति=क्षरन्ति, वर्षन्तीति भावः । अत्र सर्वत्र लुप्तोपमा 'उद्गिरन्त इव' इत्यंशे क्रियोत्प्रेक्षा चेत्यनयोः संकरः । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥४५॥
अन्वयः—अम्भोदसमागम-प्रणयिनी, स्वच्छन्दम्, अभ्यागता, रक्ता, प्रियतमा, इव, एषा, विद्युत्, पिष्टतमालवर्णकनिभैः, एतैः, अम्भोधरैः, आलिप्तम्, संसक्तैः, सुरभिभिः, शीतैः, प्रदोषानिलैः, उपवीजितम्, ( च ), कान्तम् इव, अम्बरम्, समालिङ्गति ॥ ४६ ॥
शब्दार्थ—अम्भोदसमागमप्रणयिनी = मेघ के समागम में अभिलाषा रखने वाली, (प्रियतमा-पक्ष में उपपति के साथ समागम-विषयिणी इच्छा रखने वाली), स्वच्छन्दम्=अपनी इच्छा से, अभ्यागता=समीप में आयी हुई, रक्ता=लाल रंगवाली [ प्रियतमा-पक्ष में--अनुराग करने वाली ], प्रियतमा=प्रेयसी, इव=के समान एषा=यह, सामने दिखाई देने वाली, विद्युत्=बिजली, पिष्टतमालवर्णकनिभैः=पीसे गये तमालपत्र के रंग के समान, नीले, एतैः=इन, अम्भोधरैः=बादलों से, [ प्रियतमापक्ष में--अंगराग आदि से ], आलिप्तम्=अनुलिप्त, व्याप्त, संसक्तैः=अत्यन्त घनीभूत, सुरभिभिः=सुगन्धयुक्त, शीतैः = शीतल, प्रदोषानिलैः=सायं-कालीन हवा के झोकों से, उपवीजितम्=हवा किये जाते हुये, कान्तम्=प्रेमी, इव=के समान, अम्बरम्=आकाश का, समालिङ्गति=आलिङ्गन कर रही है, लिपट रही है ॥ ४६ ॥
अर्थ—प्रिये ! देखो, देखो ।
मेघ के साथ समागमविषयिणी इच्छा रखने वाली [ प्रियतमापक्ष में--उपपति के साथ मिलने की अभिलाषा रखने वाली ] स्वयम् पास आयी हुयी लाल रंगवाली [ प्रियतमापक्ष में--अनुराग करने वाली ] प्रियतमा के समान यह बिजली पीसे गये तमालपत्र के समान नीले इन बादलों से व्याप्त, और तेज, सुगन्धित एवं शीतल सायंकालीन हवा के झकोरों से हवा किये जाते हुये प्रेमी के समान आकाश का आलिङ्गन कर रही है ॥ ४६ ॥
टीका—विद्युत्कर्तृकमेघसमालिङ्गनमाह-एतैरिति । अम्भोदेन=मेघेन उपपतिना च सह यः समागमः=सम्मेलनम्, तत्र प्रणयिनी=प्रणयवती, स्वच्छन्दम्=स्वेच्छयैव, अभ्यागता=समीपम् उपपन्ना, रक्ता=रक्तवर्णा, अनुरागवती च, प्रियतमा=प्रेयसी,