मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः ३६१
( वसन्तसेना शृङ्गारभावं नाटयन्ती चारुदत्तमालिङ्गति । )
चारुदत्तः—( स्पर्शं नाटयन् प्रत्यालिङ्ग्य । )
भो मेघ ! गम्भीरतरं नद त्वं तव प्रसादात् स्मरपीडितं मे ।
संस्पर्शरोमाञ्चितजातरागं कदम्बपुष्पत्वमुपैति गात्रम् ॥ ४७ ॥
इव=यथा, एषा=पुरो दृश्यमाना, विद्युत्=चपला, पिष्टं यत् तमालपत्रम्, तदेव वर्णकः=विलेपनम्, तन्निभैः=तत्सद्दशैः, नीलैरित्यर्थः, एतैः=गगनस्थितैः, अम्भोघरैः=जलधरैः, आलिप्तम्=सर्वत्रानुलिप्तम्, अम्बरस्य विशेषणमेतत् संसक्तैः=घनीभूतैः, तीव्रैरिति भावः, सुरभिभिः=सुगन्धिभिः, शीतैः=शीतलैः, प्रदोषानिलैः=सायन्तन-पवनैः, उपवीजितम्=पवनैः व्यजनेनेवोपसेवितमिति भावः, कान्तम्=प्रियतमम्, इव, अम्बरम्=आकाशम्, समालिङ्गति=आश्लेषयति ॥४६॥
विमर्श--यहाँ उपमा अलंकार के साथ साथ समासोक्ति अलंकार भी है क्योंकि विद्युत् में नायिका-व्यापार का और आकाश में नायक-व्यापार का समारोप है ।
अम्भोदसमागम-प्रणयिणी—यहाँ अम्भोदेन समागमः, अम्भोदसमागमः, तस्मिन् प्रणयिनी—यह समास विद्युत्-पक्ष में है। अम्भोदे समागमप्रणयिनी-यह प्रियतमा-पक्ष में समास है । अथवा अम्भोदस्य समागमे=उदये प्रणयिनी यह है । स्वच्छन्दम् अभ्यागता—कथनद्वारा चमत्कारातिशय प्रकट होता है । इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ ४६ ॥
अर्थ—( वसन्तसेना शृङ्गारभाव का अभिनय करती हुई चारुदत्त का समालिङ्गन करती है । )
अन्वयः—भो मेघ ! त्वम्, गम्भीरतरं, नद, तव, प्रसादात्, स्मरपीडितम्, मे, गात्रम्, स्पर्शरोमाञ्चितजातरागम्, ( सत् ), कदम्बपुष्पत्वाम्, उपैति ॥ ४७ ॥
शब्दार्थ—भो मेघ !=हे बादल !, त्वम्=तुम, गम्भीरतरम्=और अधिक घोर, नद=गरजो; तव=तुम्हारे, प्रसादात्=प्रसाद से, अनुग्रह से, स्मरपीडितम्=कामपीडा से व्याकुल, मे=मेरा, गात्रम्=शरीर, संस्पर्श-रोमाञ्चितजातरागम्=आलिङ्गन के कारण रोमाञ्चयुक्त और वासनायुक्त, ( सत्=होता हुआ ), कदम्बपुष्पत्वम्=कदम्ब के फूल की समानता को, उपैति=प्राप्त कर रहा है ॥ ४७ ॥
अर्थ—चारुदत्त—( स्पर्श का अभिनय करते हुये प्रत्यालिङ्गन करके । )
हे मेघ ! तुम और अधिक जोर से गरजो, तुम्हारे अनुग्रह से कामपीडित मेरा शरीर आलिङ्गन से रोमाञ्चयुक्त और कामवासनायुक्त होता हुआ कदम्ब के पुष्प की समानता को प्राप्त कर रहा है, उसी के समान हो रहा है ॥ ४७ ॥
विमर्श—संस्पर्शेन रोमाञ्चितं जातरागं च—यह विग्रह है । जातः रागः=