मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३६२ | मृच्छकटिकम् |
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विदूषकः--दासीए पुत्त ! दुद्दिण ! अणज्जो दाणि सि तुमं, जं अत्तभोदिं विज्जुआए भाआवेसि । ( दास्याः पुत्र ! दुर्द्दिन ! अनार्य इदानीमसि त्वम्, यदत्रभवतीं विद्युता भाययसि ) ।
चारुदत्तः--वयस्य ! नार्हस्युपालब्धुम् ।
वर्षशतमस्तु दुर्द्दिनमविरतधारं शतह्रदा स्फुरतु । अस्मद्विधदुर्लभया यदहं प्रियया परिष्वक्तः ॥ ४८ ॥
अनुरागः यस्मिन् तत् । स्पर्श से रोमाञ्च और अनुराग दोनों की उत्पत्ति हुई है। कदम्बपुष्प जैसे कण्टकित और राग=रक्तवर्ण युक्त होता है, उसी प्रकार चारुदत्त का शरीर हो रहा है । अतः यहां निदर्शना अलंकार है । उपजाति छन्द है ॥४७॥
**अर्थ--विदूषक--**अरे दासी के बच्चे दुर्द्दिन ! तुम इस समय बहुत नीच हो जो आर्या [ वसन्तसेना ] को बिजली से डरा रहे हो ।
**अन्वयः--**अविरतधारम्, दुर्द्दिनम्, वर्षशतम्, अस्तु, शतह्रदा, स्फुरतु, यत्, अहम्, अस्मद्विधदुर्लभया, प्रियया, परिष्वक्तः ॥ ४८ ॥
**शब्दार्थ--**अविरतधारम्=अनवरत जलधारावाला, दुर्द्दिन=मेघादि-युक्त दिन, वर्षशतम्=सैकड़ों वर्ष तक, अस्तु=बना रहे; शतह्रदा=बिजली, स्फुरतु=चमकती रहें; यत्=क्योंकि, अहम्=मैं (चारुदत्त), अस्मद्विधदुर्लभया=हमारे जैसे गरीब लोगों के लिये दुर्लभ, प्रियया=प्रियतमा वसन्तसेना के द्वारा, परिष्वक्तः=आलिङ्गित किया जा रहा हूँ ॥ ४८ ॥
**अर्थ--चारुदत्त--**मित्र ! दुर्द्दिन को उलाहना नहीं देना चाहिये--
अनवरत जलधारा वाला (यह) दुर्द्दिन सैकड़ों वर्षों तक बना रहे । बिजली चमकती रहे, क्योंकि हमारे जैसे गरीब लोगों के लिये दुर्लभ प्रिया (वसन्तसेना) के द्वारा मेरा आलिङ्गन किया जा रहा है ॥ ४८ ॥
**टीका--**दुर्द्दिनस्य प्रशंसां कृत्वा तदनुग्रह-प्रभावं वर्णयति--वर्षशतेति । अविरता=अविच्छिन्ना, धाराः=जलधाराः यस्मिन् तादृशम्, दुर्द्दिनम्=मेघाच्छन्नं दिनम्, वर्षशतम् = शतवर्षपर्यन्तम्, असीमितकालपर्यन्तमिति यावत्; अस्तु=भवतु; शतह्रदा=विद्युत, स्फुरतु=स्फुरिता भवतु, यत्=यस्मात्, निर्धनानाम्, दुर्लभा=दुष्प्रापा, तया, प्रियया=वसन्तसेनया, परिष्वक्तः=भृशमालिङ्गितः ॥ ४८ ॥
**विमर्श--**चारुदत्त उस दुर्द्दिन की महिमा का वर्णन कर रहा है जिसकी कृपा से निर्धन भी वह वसन्तसेना के आलिङ्गन का सुख प्राप्त कर रहा है । शंया शतह्रदा ह्रादिन्येरावत्यः क्षणप्रभा । अमरकोश दिग्वर्ग १।९ के अनुसार शतह्रदा=बिजली । आर्या छन्द है ॥ ४८ ॥