भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३६४ मृच्छकटिकम्

( कस्तं गुणारविन्दं शीलमृगाङ्कं जनो न जानाति ? )
आपन्न-दुःखमोक्षं चतुःसागरसारं रत्नम् ॥ १३ ॥ )
दो ज्जेव पूअणीआ एत्थ णअरीए तिलअभूदा अ ।
अज्जा वसन्तसेणा, धम्मणिही चारुदत्तो अ ॥ १४ ॥
( द्वावेव पूजनीयौ अत्र नगर्यां तिलकभूतौ च ।
आर्या वसन्तसेना धर्मनिधिश्चारुदत्तश्च ॥ १४ ॥ )

**शब्दार्थ--**गुणारविन्दम्=गुणों के कमल, कमलतुल्य गुणोंवाले, शीलमृगाङ्कम्= स्वभाव में चन्द्रमा के तुल्य, आपन्नदुःखमोक्षम्=शरणागत के दुःख दूर करनेवाले, चतुःसागरसारम्=चारों समुद्रों के सारभूत, रत्नम्=रत्न, तम्=उन आर्य चारुदत्त को, कः जनः=कौन व्यक्ति, न=नहीं, जानाति=जानता है, अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति जानता है ॥ १३ ॥

**अर्थ--**गुणों के कमल अर्थात् कमलतुल्य गुणोंवाले [ निर्मल ], चन्द्रतुल्य स्वभाववाले [ सभी को आनन्दित करनेवाले ] शरण में आये हुये के दुःखों को दूर करनेवाले, चारों समुद्रों के सारभूत उन आर्य चारुदत्त को कौन व्यक्ति नहीं जानता है ॥ १३ ॥

**टीका--**चारुदत्तस्य वैशिष्ट्यं निर्दिशति--क इति। गुणानाम्=दयादाक्षिण्या-दीनाम्, अरविन्दम् = कमलम्, कमलं यथा मधुनः निवासस्थानं तथैव अयमपि सर्वगुणानामास्पदम्, यद्वा गुणा अरविन्दम् इव यस्य तम्, शीलस्य=सत्स्वभावस्य मृगाङ्कम्=चन्द्रम् इव, चन्द्रतुल्यं सर्वेभ्य आनन्दप्रदम्, आपन्नानाम्=शरणागतानाम्, दुःखमोक्षम्=दुःखविनाशकम्, चतुर्णां समुद्राणाम्, सारम्=सारभूतम्, रत्नम्=सर्वोत्कृष्टं मणिम्, तम्=प्रसिद्धम् आर्यचारुदत्तम्, कः जनः=कः पुरुषः, न=नैव, जानाति=वेत्ति । सर्वेऽपि तं सुष्ठु जानन्तीत्यर्थः । रूपकमलंकारः । आर्या वृत्तम् ॥ १३ ॥

**विमर्श--**गुणारविन्दम्=गुणानाम् अरविन्दम् अथवा गुणैः अरविन्दम् इव--ऐसा विग्रह करके कथञ्चित् समास उपपादित करना चाहिये । इसी प्रकार शील-मृगाङ्कम्=शीले मृगाङ्कम् इव ऐसा विग्रह करना चाहिये । इन दोनों का तात्पर्यार्थ लेना ही उचित है। रूपक अलंकार सम्भव है। आर्या वृत्त है ॥ १३ ॥

**अन्वयः--**इह, नगर्याम्, द्वौ एव, पूजनीयौ, तिलकभूतौ, च, आर्या, वसन्तसेना, धर्मनिधिः, चारुदत्तः, च ॥ १४ ॥

**शब्दार्थ--**इह=इस, नगर्याम्=( उज्जयिनी ) नगरी में, द्वौ=दो, एव=ही, पूजनीयौ=पूजा के योग्य, च=और, तिलकभूतौ=तिलक के समान सर्वोच्च हैं, आर्या=सम्माननीय, वसन्तसेना=वसन्तसेना, च=और, धर्मनिधिः=धर्म के सिन्धु, चारुदत्तः=चारुदत्त ॥ १४ ॥

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