मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३६३
वीरकः-- (चन्दनकमुपसृत्य) एसो पवहणवाहओ भणादि--'अज्जचारुदत्तश्श पवहणं, वशन्तशेणा आलूढ़ा, पुप्फकरण्डअं जिण्णुज्जाणं णीअदि' त्ति। (एष प्रवहणवाहको भणति—'आर्यचारुदत्तस्य प्रवहणम्, वसन्तसेना आरूढ़ा, पुष्पकरण्डकं जीर्णोद्यानं नीयते, इति ।)
चन्दनकः--ता गच्छदु। (तद्गच्छतु ।)
वीरकः--अणवलोइदो ज्जेव ? (अनवलोकित एव ?)
चन्दनकः--अध इं। (अथ किम् ।)
वीरकः—कस्स पच्चाएण ? (कस्य प्रत्ययेन ?)
चन्दनकः— अज्जचारुत्तस्स (आर्यचारुत्तस्य ।)
वीरकः-को अज्जचारुदत्तो ? का वा वसन्तसेणा ? जेण अणवलोइदं वज्जइ। (क आर्यचारुदत्तः ? का वा वसन्तसेना ? येनानवलोकितं व्रजति ।)
चन्दनकः-अरे ! अज्जचारुदत्तं ण जाणासि ? ण वा वसन्तसेणिअं ? जइ अज्जचारुदत्तं वसन्तसेणिअं वा ण जाणासि, ता गअणे जोण्हासदिदं चन्दं पि तुमं ण जाणासि । (अरे ! आर्यचारुदत्तं न जानासि ? न वा वसन्तसेनिकाम् ? यदि आर्यचारुदत्तं वसन्तसेनिकां वा न जानासि, तदा गगने ज्योत्स्नासहितं चन्द्रमपि त्वं न जानासि ।)
को तं गुणारविन्दं सीलसिअङ्कं जणो ण जाणादि ?
आवण्ण-दुक्ख-मोक्खंचउ-साअर-सारअं रअणं ॥ १३ ॥
वीरक— (चन्दनक के पास जाकर) यह गाड़ीवाला ऐसा कह रहा है— 'आर्य चारुदत्त की गाड़ी है। इस पर वसन्तसेना बैठी है। पुष्पकरण्डक जीर्ण उद्यान में ले जाई जा रही है?'
चन्दनक— तो जाने दो।
वीरक— विना देखे हुये ही।
चन्दनक— और क्या ?
वीरक— किसके विश्वास से ?
चन्दनक— आर्य चारुदत्त के।
वीरक— कौन आर्य चारुदत्त ? और कौन वसन्तसेना ? जिनके कारण विना देखे हुये ही जा रही है ?
चन्दनक— अरे आर्य चारुदत्त को नहीं जानते हो ? और न वसन्तसेना को जानते हो ? यदि आर्य चारुदत्त को और वसन्तसेना को नहीं जानते हो तो आकाश में चांदनी के सहित चन्द्रमा को भी नहीं जानते हो।
अन्वयः— गुणारविन्दम्, शीलमृगाङ्कम्, आपन्नदुःखमोक्षम्, चतुःसागरसारम्, रत्नम्, तम्, कः, जनः, न, जानाति ॥ १३ ॥