भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३६२ मृच्छकटिकम्

वीरकः-- (अवलोक्य) अरे पवहणवाहआ ! मा दाव एदं पवहणं वाहेहि । कस्सकेरके एदं पवहणं ? को वा इध आरूढो ? कहिं वा वज्जइ ? (अरे प्रवहणवाहक ! मा तावदेतत् प्रवहणं वाह्य । कस्यैतत् प्रवहणम् ? को वा इहारूढः ? कुत्र वा व्रजति ? )

चेटः-- एशे क्खु पवहणे अज्जचालुदत्तशकेलके, इध अज्जआ वशन्तशेणा आल्रूढा, पुप्फुकरण्डअं जिण्णुज्जाणं कीलिदं चालुदत्तश्श णीअदि । (एतत् खलु प्रवहणमार्यचारुदत्तस्य, इह आर्या वसन्तसेना आरूढा, पुष्पकरण्डकं जीर्णोद्यानं क्रीडितुं चारुदत्तस्य नीयते' इति ।)


विचारय = सोचो, विचार करो, कस्य = किसकी, प्रवहणम् = गाड़ी है, कुत्र = कहाँ, प्रेषितम् = भेजी गयी है ॥ १२ ॥

अर्थ-- [वस्त्रादि से] ढकी हुयी यह किसकी गाड़ी राजमार्ग के बीच से जा रही है, यह विचार करो, किसकी गाड़ी है और कहाँ भेजी गयीं है ? ॥ १२ ॥

टीका-- प्रवहणं विलोक्य तद्विषयिणीं जिज्ञासामाह — अपवारितेति । अपवारितम् = वस्त्रादिनाच्छादितम्, अनिषिद्धं वा, प्रवहणम् = शकटयानम्, राजमार्गस्य = मुख्यमार्गस्य, मध्येन = मध्यभागेन, व्रजति = याति, तावत् हेतोरिति भावः, एतत् = इदम्, विचारय = चिन्तय, पृच्छ वा, कस्य = कस्य जनस्य, प्रवहणम् = शकटयानम्, कुत्र = कस्मिन् स्थाने, प्रेषितम् = गमनाय निर्दिष्टम्, इति = इदं जानीहि । अपवारितेऽस्मिन् प्रवहणे गोपालदारको भवितुमर्हति अतस्त्वरितमेवान्वेषणीयमिदमिति भावः ।

अत्र गाथा वृत्तम् ॥ १२ ॥

विमर्श-- अपवारितम् = सामान्यतया इसका अर्थ 'ढका हुआ' होता है । परन्तु—'विना रोकटोक के'—यह भी हो सकता है । क्योंकि जल्दी-जल्दी जानेवाली गाड़ी में छिपा हुआ आर्यक भाग सकता है, ऐसी शंका स्वाभाविक है ॥ १२ ॥

शब्दार्थ-- इहारूढः=इस गाड़ी पर बैठा है, क्रीडितुम्=क्रीडाविहार के लिये, अनवलोकितः=विना देखी हुई, विनाजांच पड़ताल की हुई, प्रत्ययेन=विश्वास से, ज्योत्स्नासहितम्=चाँदनी के साथ ।

अर्थ--वीरक--(देख कर) अरे गाड़ीवान ! इस गाड़ी को आगे मत ले जाओ । यह किसकी गाड़ी है ? इस पर कौन बैठा है ? और कहाँ जा रही है ?

चेट--यह आर्य चारुदत्त की गाड़ी है । कामक्रीडा-विहारसम्बन्धी इस गाड़ी पर आर्या वसन्तसेना विराजमान हैं । आर्य चारुदत्त के समीप पुष्प-करण्डक जीर्णोद्यान में क्रीडा के लिये ले जाई जा रही है ।

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