भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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षष्ठोऽङ्कः ३९१

( अपहरति कोऽपि त्वरितं चन्दनक ! शपे तव हृदयेन ।
यथा अर्द्धोदितदिनकरे गोपालक-दारकः खुडितः ॥ ११ ॥ ),

चेटः—जाध गोणा ! जाध । ( यातं गावो ! यातम् । )
चन्दनकः—(दृष्ट्वा) अरे रे ! पेक्ख पेक्ख । ( अरे रे ! प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व । )

ओहारिओ पवहणो वच्चइ मज्झेण राअमग्गस्स ।
एदं दाव विआरह, कस्स कहिं पवसिओ पवहणो त्ति ॥ १२ ॥
( अपवारितं प्रवहणं व्रजति मध्येन राजमार्गस्य ।
एत्ततावद्विचारय कस्य कुत्र प्रेषितं प्रवहणमिति ॥ १२ ॥ )

शब्दार्थ—हे चन्दनक=हे चन्दनक; तव=तुम्हारी, हृदयेन=हृदय से, शपे=शपथ खाता हूँ, कोऽपि = कोई ( आर्यकम्=गोपाल के पुत्र ), त्वरितम्=शीघ्र ही, अपहरति=लेकर भाग रहा है, यथा = जैसे कि, अर्द्धोदितदिनकरे=सूर्य के आधा निकलने पर, गोपालदारकः = गोपाल का पुत्र आर्यक, खुटितः = बन्धन तोड़कर भगाया गया ॥ ११ ॥

अर्थवीरक - वीर चन्दनक !
मैं तुम्हारे हृदय की शपथ खाता हूँ। हे चन्दनक ! कोई जल्दी से ( आर्यक को छुड़ा कर) लेकर जा रहा है। सूर्य के आधा निकलने पर वह गोपालपुत्र [किसी के द्वारा ] बन्धन तोड़कर भगाया जा रहा है ॥ ११ ॥

टीका—आर्यकस्य पलायनं सत्यमिति प्रतिपादयति —अपहरतीति । हे चन्दनक !, तव=त्वदीयेन, हृदयेन=चित्तेन, शपे=शपथं गृह्णामि, कोऽपि=अज्ञातनामा, आर्यकम्, त्वरितम्=शीघ्रमेव, अपहरति=बन्धनान्मोचयित्वा नयति, यथा=यतोहि, अर्द्धोदिते दिनकरे = सूर्ये, गोपालदारकः=गोपालपुत्रः, आर्यकः, खुटितः=बन्धनं विदार्य मोचित इति भावः। आर्या वृत्तम् ॥ ११ ॥

विमर्श—तव हृदयेन शपे=तुम्हारे हृदय से शपथ लेता हूँ -- यह अर्थ सामान्यतया प्रतीत होता है । परन्तु दूसरे के हृदय की शपथ दूसरा ले, यह व्यावहारिक नहीं प्रतीत होता है । अतः हृदयेन तव शपे=अपने हृदय से तुमको शपथ लेकर कहता हूँ—ऐसा भावार्थ करना चाहिये ॥ ११ ॥

अर्थचेट - चलो बैलों ! चलो ।
चन्दनक—अरे, अरे, देखो देखो—

अन्वयः—अपवारितम्, प्रवहणम्, राजमार्गस्य, मध्येन, व्रजति, तावत्, एतत्, विचारय, कस्य, प्रवहणम्, कुत्र, प्रेषितम्, इति ॥ १२ ॥

शब्दार्थ—अपवारितम्=वस्त्रादि से ढकी हुई, प्रवहणम्=गाड़ी, राजमार्गस्य=मुख्य मार्ग के, मध्येन=बीच से, व्रजति=जा रही है, तावत्=इसलिये, एतत्=यह,

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