भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 484

३९६ मृच्छकटिकम्

आर्यकः—( स्वगतम् ) अयं मे पूर्ववैरी, अयं मे पूर्वबन्धुः । यतः—

एककार्यनियोगेऽपि नानयोस्तुल्यशीलता । विवाहे च चितायाञ्च यथा हुतभुजोर्द्वयोः ॥ १६ ॥

चन्दनकः—तुमं तन्तिलो सेणावई रण्णो पच्चइदो, एदे धारिदा मए वइल्ला, अवलोएहि । ( त्वं तन्त्रिलः सेनापतिः राज्ञः प्रत्ययितः, एतौ धारितो मया बलीवर्दौ, अवलोकय । )

अर्थ—आर्यक—( अपने में ) यह ( वीरक ) मेरा पुराना शत्रु है और यह ( चन्दनक ) मेरा पुराना मित्र है। क्योंकि—

**अन्वयः—**एककार्यनियोगे, अपि, अनयोः, तुल्यशीलता, न, यथा, विवाहे, च, चितायाम्, च, द्वयोः, हुतभुजोः [ तुल्यशीलता न ] ॥ १६ ॥

**शब्दार्थ—**एककार्यनियोगे=एक ही प्रकार के कार्य में लगे रहने पर, अपि=भी, अनयोः = इन दोनों चन्दनक और वीरक का, तुल्यशीलता = एक प्रकार का स्वभाव, न=नहीं है, यथा=जिस प्रकार, विवाहे=विवाह में, च=और, चितायाम्=श्मशान की चिता में, द्वयोः=दोनों, हुतभुजोः=अग्नियों की, [ तुल्यशीलता=समानस्वभावता, न=नहीं होती हैं ] ॥ १६ ॥

अर्थ—[ पलायित अपराधी को पकड़ना रूपी ] एक ही कार्य में लगे रहने पर भी इन दोनों वीरक और चन्दनक का स्वभाव एक जैसा नहीं है, जिस प्रकार विवाह में और श्मशान की चिता में अग्नि एक प्रकार की नहीं मानी जाती है ॥ १६ ॥

टीका—वीरकचन्दनकयोः स्वभावस्यान्तरं प्रतिपादयति आर्यकः—एकेति । एककार्ये=मम बन्धनरूपे एकस्मिन्नेव कर्मणि नियोगे=नियोजने, अपि, अनयोः=वीरकचन्दनकयोः, तुल्यशीलता=तुल्यस्वभावत्वम् न=नैव, अस्ति, यथा=येन प्रकारेण, विवाहे पाणिग्रहणसंस्कारे, चितायाम् च=शवदाहार्थं प्रयुक्तायां चितायाम् च, तुल्यशीलता नैव दृश्यते । पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ।। १६ ।।

विमर्श—तुल्यशीलता=तुल्यं शीलं ययोः ते शीले, तद्भावः । दोनों को आर्यक की खोज करने का कार्य सौंपा गया है परन्तु वीरक धूर्तता के साथ और चन्दनक शालीनता से सम्पादित कर रहा है ॥ १६ ॥

**शब्दार्थ—**तन्त्रिलः=प्रधान, प्रत्ययितः=विश्वस्त, धारितः=पकड़ लिये गये, उत्नामय=उठाओ, धुरम्=जुआ को ।

**अर्थ—चन्दनक—**तुम प्रधान सेनापति राजा के विश्वासपात्र हो; मैंने इन दोनों बैलों को पकड़ लिया है, देख लो ।