मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 513, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽङ्कः ४२५
तदेहि, गच्छावः। (परिक्रम्य) कथमभिमुखमनाभ्युदयिकं श्रमणकदर्शनम्।
(विचार्य) प्रविशत्वयमनेन पथा, वयमप्यनेनैव पथा गच्छामः।
( इति निष्क्रान्तः। )
इत्यार्यकापहरणं नाम सप्तमोऽङ्कः।
-: ० :-
**टीका—**तदानीं चारुदत्तो दुर्निमित्तोत्पत्तिं वसन्तसेनायाः अदर्शनमूलिकां चिन्तयति—अपश्यत इति। अद्य=अस्मिन् काले, ताम्=पूर्वोक्ताम्, मदीयाम् कान्ताम्=प्रेयसीम्, वसन्तसेनामित्यर्थः, अपश्यतः=अनवलोकयतः मम=चारुदत्तस्य, वामम्=सव्येतरम्, लोचनम्=नेत्रम्, स्फुरति=स्पन्दते, अकारणं परित्रस्तम्=व्याकुलम्, हृदयम्=चित्तम्, व्यथते=व्यग्रं भवति। विभावनालंकारः, आर्या वृत्तम् ॥ ९ ॥
**विमर्श—**भावी अनिष्ट के संकेत को चारुदत्त ठीक से नहीं समझ पा रहा है। वह उसे वसन्तसेना के दर्शन न होने के कारण होने वाला मान रहा है। यहाँ कारण के अभाव में कार्योत्पत्ति होने से विभावना अलंकार है ॥ ६ ॥
**अर्थ—**इस लिये आओ, चलें। (घूम कर) अरे सामने अमङ्गलसूचक इस बौद्ध संन्यासी का दर्शन क्यों ? (सोचकर) यह इस मार्ग से प्रवेश करे, आये। हम लोग इस (दूसरे) मार्ग से चल रहे हैं।
(इस प्रकार सभी निकल जाते हैं।)
"इस प्रकार आर्यक का अपहरण नामक सप्तम अङ्क समाप्त हुआ॥
॥ इस प्रकार जयशङ्करलाल-त्रिपाठि-विरचित 'भावप्रकाशिका, हिन्दी-संस्कृत-व्याख्या में मृच्छकटिक का सप्तम अंक समाप्त हुआ ॥