मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२४ मृच्छकटिकम्
( वामाक्षिस्पन्दनं सूचयित्वा ) सखे मैत्रेय ! वसन्तसेनादर्शनोत्सुकोऽयं जनः । पश्य —
अपश्यतोऽद्य तां कान्तां वामं स्फुरति लोचनम् ।
अकारणपरित्रस्तं हृदयं व्यथते मम ॥ ६ ॥
प्रशस्तम्=अच्छा है, मैत्रेय=मित्र मैत्रेय !, निगडम्=बेड़ी को, पुराणकूपे=पुराने कुआँ में, ( जिसका पानी सूख जाने से कोई वस्तु दिखाई नहीं देती है ), क्षिप=फेंक दो, हि=क्योंकि, क्षितिपतयः=राजा, चारदृष्ट्या=गुप्तचररूपी नेत्र से, पश्येयुः=देख लेंगे ॥ ८ ॥
अर्थ—चारुदत्त—
राजा पालक का ऐसा [ आर्यकरक्षारूपी ] महान् अपराध करके यहाँ क्षण भर भी रुकना ठीक नहीं है । हे मैत्रेय ! बेड़ी को पुराने [ अन्धे ] कुआँ में फेंक दो । क्योंकि राजा लोग गुप्तचर रूपी नेत्र से देख लेंगे ॥ ८ ॥
**टीका—**सुरक्षितं कृत्वाऽऽर्यकं विसृज्य चारुदत्तः आत्मनः सुरक्षार्थं मैत्रेयं निर्दिशति–कृत्वैवमिति । एवम्=इत्थम्, मनुजपतेः=राज्ञः पालकस्येत्यर्थः, महत्=अत्यन्तम्, व्यलीकम्=अप्रियम्, अहितमिति भावः, कृत्वा=विधाय, अस्मिन्=प्रदेशे इत्यर्थः, क्षणम् अपि=मुहूर्तमपि, स्थातुम्=वर्तितुम्, नहि=नैव, प्रशस्तम्=युक्तम्, अतः हे मैत्रेय=मित्र, निगडम्=आर्यकस्य पादादपाकृतं निगडम्, पुराणकूपे=जलादिशून्ये 'अन्धकूपे' इति प्रसिद्धम्, क्षिप=पातय, हि=यस्मात्, क्षितिपतयः=राजानः, चारदृष्ट्या=गुप्तचररूपदृष्ट्या, पश्येयुः=अवलोकयेयुः । 'चारैः पश्यन्ति राजानः' इति वचनमनुस्मृत्य चारुदत्तः भयमुपैति । अत्र कारणेन कार्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासोऽलङ्कारः, प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥ ८ ॥
अर्थ—( बायीं आँख का फड़कना सूचित करके ) मित्र मैत्रेय । यह व्यक्ति [ मैं ] वसन्तसेना के दर्शन के लिये अति उत्सुक है । देखो —
**अन्वयः—**अद्य, ताम्, कान्ताम्, अपश्यतः, मम, वामम्, लोचनम्, स्फुरति, अकारणपरित्रस्तम्, मम, हृदयम्, व्यथते ॥ ६ ॥
**शब्दार्थ—**अद्य=आज, इस समय, ताम्=उस, कान्ताम्=प्रेयसी वसन्तसेना को, अपश्यतः=न देखने वाले, मम=मेरा [ चारुदत्त का ], वामम्=बाँया, लोचनम्=आँख, स्फुरति=फड़क रही है, अकारणपरित्रस्तम्=बिना किसी कारण के घबड़ाया हुआ, हृदयम्=हृदय, व्यथते=व्यथित हो रहा है, परेशान हो रहा है ॥ ९ ॥
अर्थ—आज [ इस समय ] उस प्रेयसी वसन्तसेना का दर्शन न करने वाले मेरी बाँयी आँख फड़क रही है । बिना किसी कारण के घबड़ाया हुआ मेरा हृदय व्यथित हो रहा है ॥ ९ ॥