मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४२५ | मृच्छकटिकम् |
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शिल मुण्डिदे तुण्ड मुण्डिदे चित्त ण मुण्डिदे कीश मुण्डिदे।
जाह उण अ चित्त मुण्डिदे शाहु सुट्ठु शिल ताह मुण्डिदे ॥ ३ ॥
(शिरो मुण्डितं तुण्डं मुण्डितं चित्तं न मुण्डितं किं मुण्डितम् ?
यस्य पुनश्च चित्तं मुण्डितं साधु सुष्ठु शिरस्तस्य मुण्डितम् ॥ ३ ॥)
गिहिद-काशाओदए एशे चीवले, जाव एदं लट्टिअ-शालकाहकेल्के सज्जाणे पविशिअ पोक्खलिणीए पक्खाजिअ लहुं लहुं अवक्कमिश्शं।
अन्वयः—शिरः, मुण्डितम्, तुण्डम्, मुण्डितम्, (यदि) चित्तम्, न, मुण्डितम्, (तदा) किम्, मुण्डितम्; पुनः, यस्य, च, चित्तम्, साधु, मुण्डितम्, तस्य, शिरः, सुष्ठु, मुण्डितम् ॥ ३ ॥
शब्दार्थ—शिरः=शिर, मुण्डितम्=मुड़ा लिया, तुण्डम्=मुंह (दाढ़ी-मूँछ), मुण्डितम्=मुड़ा ली, यदि=यदि, चित्तम्=मन, न=नहीं, मुण्डितम्=स्वच्छ कराया, तदा=तब, किम्=क्या, मुण्डितम्=मुड़ाया, स्वच्छ कराया, पुनः च = और फिर, यस्य=जिसका, चित्तम्=चित्त; मुण्डितम्=मुड़ाया हुआ, स्वच्छ करवाया हुआ है, तस्य=उसका, शिरः=सिर, सुष्ठु=अच्छी प्रकार से, मुण्डितम्=मुड़ा हुआ है ॥ ३ ॥
अर्थ—शिर मुड़ा लिया, मुख (दाढ़ी मूंछ) मुड़ा ली किन्तु यदि चित्त नहीं मुड़ाया तो उसने क्या मुड़ाया। और जिसने चित्त मुड़ाया उसीने शिर भी अच्छी प्रकार मुड़ा लिया ॥ ३ ॥
टीका—बाह्यशरीरशुद्धिरेव न पर्याप्ता, किन्तु अन्तःशुद्धिरपीति प्रतिपाद-यति—शिर इति। शिरः=मस्तकम्, तत्रास्थाः केशा इत्यर्थः, मुण्डितम्=केशरहितं कृतम्, तुण्डम्=मुखम्, मुण्डितम्=श्मश्वादिशून्यं कृतम्, यदि=परन्तु यदि, चित्तम्=अन्तःकरणम्, न=नैव, मुण्डितम्=स्वच्छं कृतम्, किं मुण्डितम्=किं परिष्कृतम्, न किमपीति भावः। पुनश्च, यस्य=जनस्य, चित्तम् = अन्तःकरणम्, मुण्डितम्=स्वच्छं कृतम्, विषयविकारशून्यं सम्पादितम्, तस्य=जनस्य, शिरः=मस्तकम्, साधु=सम्यग् रूपेण, मुण्डितम्=स्वच्छं कृतम्। एवञ्च चित्तशुद्धिरेव तात्त्विकी तदर्थमेव यतनीयमिति तदभिप्रायः। वैतालीयं वृत्तम् ॥ ३ ॥
विमर्श—भिक्षु का आशय यह है कि जब तक चित्त की शुद्धि नहीं होती है तब तक शिर, दाढ़ी मूंछ मुड़ाना ढोंग है। कवि की यह व्यङ्ग्योक्ति है। इसमें भी वैतालीय छन्द है। लक्षण पूर्वश्लोक के विमर्श में देखें ॥ ३ ॥
शब्दार्थ—गृहीतकषायोदकम्=कसैले रंग के पानी को सोख लेने वाला, चीवरम्=वस्त्र-खण्ड, पुष्करिण्याम्=पोखरी तलैया में, लघु-लघु = बहुत जल्दी, नासिकाम्=नाक को, विदध्वा=छेद कर, अपवाहयति=बाहर निकाल देता है, अशरणः=असहाय।