भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 517

अष्टमोऽङ्कः ४२६

( गृहीत-कषायोदकमेतत् चीवरम्, यावदेतत् राष्ट्रियश्यालकस्य उद्याने प्रविश्य पुष्करिण्यां प्रक्षाल्य लघु लघु अपक्रमिष्यामि । ) ( परिक्रम्य तथा करोति ) ।

( नेपथ्ये )

शकारः—चिट्ठ, ले दुट्ठशमणका ! चिट्ठ । (तिष्ठ, रे दुष्टश्रमणक तिष्ठ ।)

भिक्षुः—( दृष्ट्वा सभयम् ) ही अविदमाणहे ! एशे शे लाअशाल-शण्ठाणे आगदे । एक्केण भिक्खुणा अवलाहे किदे अण्णं वि जंहिं जंर्हि भिक्खुं पेक्खदि, तहिं तहिं गोणं विअ णासं विन्धिश्र ओवाहेदि । ता कहिं अशलणे शलणं गमिश्शं ? अथवा भट्टालके ज्जेव बुद्धे मे शलणे । ( आश्चर्यम् । एष स राज-श्याल-संस्थानक आगतः । एकेन भिक्षुणा अपराधे कृते, अन्यमपि यस्मिन् यस्मिन् भिक्षुं प्रेक्षते, तस्मिन् तस्मिन् गामिव नासिकां विद्ध्वा अपवाहयति । तत् कस्मिन् अशरणः शरणं गमिष्यामि ? । अथवा भट्टारक एव बुद्धो मे शरणम् । )

( प्रविश्य सखड्गेन विटेन सह । )

शकारः—चिट्ठ, ले दुट्ठशमणका ! चिट्ठ आवाणअ-मज्झ-पविट्ठश्श विअ लत्तमूलअश्श शीशं दे मोडइश्शं । (तिष्ठ रे दुष्टश्रमणक ! तिष्ठ । आपानक-मध्य-प्रविष्टस्येव रक्तमूलकस्य शीर्षं ते भङ्क्ष्यामि । ) ( इति ताडयति । )


अर्थ—यह वस्त्र कसैले=गेरुआ रंग के पानी को सोख चुका है, ( रंग गया है ) तो अब राजा के शाले के बगीचे में घुस कर पुष्करिणी पोखरी में धोकर जल्दी ही भाग चलूँगा । ( घूमकर वैसा ही करता है । )

( पर्दे के पीछे से )

अर्थशकारः—रुक जा दुष्ट बौद्ध संन्यासी, रुक जा ।

भिक्षु—( देख कर भय के साथ ) आश्चर्य है, यह तो राजा का ( दुष्ट ) शाला संस्थानक आ गया । किसी एक भिक्षुक के अपराध करने पर जहाँ कहीं भी जिस किसी भी भिक्षुक को देखता है वहाँ वहाँ बैल के समान [ उसकी ] नाक को छेद कर बाहर भगा देता है । इसलिये बेसहारा अब मैं किसकी शरण में जाऊँ ? अथवा स्वामी बुद्ध ही मेरे रक्षक हैं ।

शब्दार्थ—आपानक=मदिरा पीने वालों की गोष्ठी, रक्तमूलकस्य=लाल मूली ( ताजी मूली ) के, भङ्क्ष्यामि=काट डालूँगा, निर्वेदधूतकषायम्=वैराग्य के कारण गेरुआ रंग के कपड़े पहनने वाले, सुखोपगम्यम्=आनन्दपूर्वक सेवन करने योग्य ।

( तलवारधारी विट के साथ प्रवेश करके )

अर्थशकार—रुक जा दुष्ट बौद्ध संन्यासी ! रुक जा । मदिरा पीने वालों के बीच में रखी हुई लाल (ताजी) मूली के समान तेरा शिर काट डालूँगा । [ काट डालता हूँ । ] [ यह कह कर पीटता है । ]