भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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अष्टमोऽङ्कः ४३५

शकारः— मावि गच्छदु, मावि चिट्ठदु, मावि ऊश्शशदु, मावि णीशशदु। इध ज्जेव झत्ति पड़िअ मलेदु। (मापि गच्छतु, मापि तिष्ठतु, मापि उच्छ्वसितु, मापि निःश्वसितु। इहैव झटिति पतित्वा म्रियताम्।)

भिक्षुः— णमो बुद्धश्श। शलणागदेम्हि। (नमो बुद्धाय। शरणागतोऽस्मि।)

विटः— गच्छतु।

शकारः— ...णं शमएण। (ननु समयेन।)

विटः— कीदृशः समयः?

शकारः— तधा कद्दमं फेलदु, जहा पाणिअं पङ्काइलं ण होदि। अथवा पाणिअं पुञ्जीकदुअ कद्दमे फेलदु। (तथा कर्दमं क्षिपतु, यथा पानीयं पङ्काविलं न भवति। अथवा पानीयं पुञ्जीकृत्य कर्दमे क्षिपतु।)

विटः— अहो मूर्खता?

विपर्यस्तमनश्चेष्टैः शिला-शकल-वर्ष्मभिः।
मांसवृक्षैरियं मूर्खैर्भाराक्रान्ता वसुन्धरा ॥ ६ ॥


शकार— न जाय, न रुके, न उच्छ्वास ले, न निश्वास ले, यहीं शीघ्र गिर कर मर जाय।

भिक्षु— भगवान् बुद्ध को प्रणाम। मैं शरण में आया हूँ।

विट— चला जाय।

शकार— शर्त के साथ।

विट— कैसी शर्त?

शकार— उस प्रकार से कींचड़ फेके जिससे पानी गन्दा न हो, अथवा पानी को इकट्ठा करके कीचड़ में फेंके।

अन्वयः— विपर्यस्तमनश्चेष्टैः, शिलाशकलवर्ष्मभिः मांसवृक्षैः, मूर्खैः, इयम्, धरा, भाराक्रान्ता, अस्ति ॥ ६ ॥

शब्दार्थ— विपर्यस्तमनश्चेष्टै = विपरीत = अव्यवस्थित मन और कार्य वाले, शिलाशकलवर्ष्मभिः = पत्थर के टुकड़े के समान [मोटे या बेकार] शरीर वाले, मांसवृक्षैः = मांस के पेड़ों से, मांसमय पेड़ों से, मूर्खै = मूर्खों से, इयम् = यह, धरा = पृथिवी, भाराक्रान्ता = बोझ से दबी हुई, अस्ति = है ॥ ६ ॥

अर्थ—विट— अहो मूर्खता !

[लोक से] विपरीत मन और काम वाले, पत्थर के टुकड़े के समान शरीर वाले, मांस के वृक्ष मूर्खों से यह पृथ्‍वी बोझ से दबी हुई है ॥ ६ ॥

टीका— शकारस्य मूर्खतामयं वचनमाकर्ण्य विटः खेदं प्रकटयति-विपर्यस्तेति। विपर्यस्ते=विपरीते मनश्चेष्टे येषाम् यद्वा विपरीता=लोकविरुद्धा मनसः चेष्टा=