मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४३४ | मृच्छकटिकम् |
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भिक्षुः—उवाशके ! एव्वं, अचिल-पव्वजिदे हग्गे । ( उपासक ! एवम्, अचिरप्रव्रजितोऽहम् । )
शकारः—ता कीश तुमं जातमेत्तक ज्जेव ण पव्वजिदे ? ( तत् केन त्वं जातमात्र एव न प्रव्रजितः ? ) ( इति ताडयति । )
भिक्षुः—णमो बुद्धश्श । ( नमो बुद्धाय । )
विटः—किमनेन ताडितेन तपस्विना ? मुच्यतां, गच्छतु ।
शकारः—अले ! चिट्ठ दाव, जाव शम्पधालेमि । ( अरे ! तिष्ठ तावत् यावत् सम्प्रधारयामि । )
विटः—केन सार्द्धम् ?
शकारः—अत्तणो हडक्केण । ( आत्मनो हृदयेन । )
विटः—हन्त ! न गतः ।
शकारः—पुत्तका हडक्का ! भट्टके ! पुत्तके ! एशे शमणके अवि णाम किं गच्छदु, किं चिट्ठदु ? ( स्वगतम् ) णावि गच्छदु, णावि चिट्ठदु । ( प्रकाशम् ) भावे ! शम्पधालिदं मए हडक्केण शह । एशे मह हडक्के भणादि । ( पुत्रक हृदय ! भट्टारक ! पुत्रक ! एष श्रमणकः अपि नाम किं गच्छतु, किं तिष्ठतु ?) (नापि गच्छतु, नापि तिष्ठतु ।) (भाव ! सम्प्रधारितं मया हृदयेन सह । एतन्मम हृदयं भणति । )
विटः—किं ब्रवीति ?
अर्थ—भिक्षु—उपासक ! ऐसा ही है, मैंने कुछ ही पहले संन्यास-ग्रहण किया है।
शकार—तो तुम पैदा होते ही संन्यासी क्यों नहीं बन गये ? ( ऐसा कह कर पीटने लगता है । )
भिक्षु—बुद्ध भगवान को नमस्कार ।
विट—इस बेचारे संन्यासी को पीटने से क्या लाभ ? छोड़ दीजिये, यहाँ से चला जाय ।
शकार—अरे रुक जा जब तक मैं निश्चय करता हूँ ।
विट—किसके साथ ?
शकार—अपने हृदय के साथ ।
विट—हाय ! नहीं गया ।
शकार—बेटा हृदय ! स्वामी ! पुत्रक ! क्या यह बौद्ध संन्यासी चला जाय अथवा रुका रहे ? ( अपने में ) न जाये न रुके ( प्रकट में ) भाव ! मैंने मन के साथ सोच लिया । मेरा मन यह कह रहा है ।
विट—क्या कह रहा है ?