मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽङ्कः ४४७
शकारः—भाव ! आअच्छ, पवहणं पेक्खामो । भावे ! तुमं पि मे गुलु पलगुलु पेक्खिशि शादलके अब्भन्तलके त्ति पुलक्कलणीएत्ति तुमं दाव पवहणं अग्गदो अहिलुह । ( भाव ! आगच्छ, प्रवहणं पश्यावः। भाव ! त्वमपि मे गुरुः परमगुरुः, प्रेक्ष्यसे सादरकः अभ्यन्तरक इति पुरस्कारणीय इति त्वं तावत् प्रवहणमग्रतः अधिरोह । )
विटः— एवं भवतु । ( इत्यारोहति )
शकारः—अधवा चिट्ठ तुमं । तुह वप्पकेलके पवहणे ? जेण तुमं अग्गदो अहिलुहशि । हग्गे पवहणशामी अग्गदो पवहणं अहिलुहामि ! ( अथवा तिष्ठ त्वम् । तव वप्रीयं (पितुः) प्रवहणम् येन त्वमग्रतः अधिरोहसि । अहं प्रवहणस्वामी, अग्रतः प्रवहणमधिरोहामि । )
विटः—भवानेवं ब्रवीति ।
शकारः—जइ वि हग्गे एवं भणामि, तथावि तुह एशे आदले अहिलुह भट्टकेत्ति भणिदूं । ( यद्यपि अहमेवं भणामि, तथापि तव एष आदरः 'अधिरोह भट्टारक' इति भणितुम् । )
विटः—आरोहतु भवान् ।
शकारः— एशे शम्पदं अहिलुहामि । पुत्तका ! थावलका ! चेडा ! पलिवत्तावेहि पवहणं । ( एष साम्प्रतमधिरोहामि । पुत्रक ! स्थावरक ! चेट ! परिवर्तय प्रवहणम् । )
चेटः— ( परावर्त्य ) अहिलुहदु भट्टालके । ( अधिरोहतु भट्टारकः । )
अर्थ—शकार—भाव ! आओ, हम दोनों गाड़ी देखें । भाव ! तुम भी मेरे गुरु हो, परमगुरु हो । तुम्हें मैं आदर से देखता हूँ, तुम मेरे मन की बात जानने वाले हो, इस लिये तुम आगे चलने योग्य हो अतः पहले तुम्हीं गाड़ी पर चढ़ो ।
विट— ऐसा ही हो । ( यह कह कर चढ़ता है । )
शकार— अथवा तुम रुक जाओ । तुम्हारे बाप की गाड़ी है जो तुम आगे ( पहले ) चढ़ रहे हो । मैं गाड़ी का मालिक हूँ, अतः गाड़ी पर पहले मैं चढ़ता हूँ ।
विट— आपने ही ऐसा कहा था ।
शकार— यद्यपि मैंने ऐसा कहा था किन्तु किन्तु तुम्हें यह आदर प्रदर्शित करना चाहिये था 'स्वामी आप गाड़ी पर चढ़ें ।'
विट— आप चढ़िये ।
शकार— अब मैं चढ़ता हूँ । बेटा, स्थावरक, चेट ! गाड़ी घुमाओ ।
चेट— ( गाड़ी घुमाकर ) स्वामिन् ! गाड़ी पर चढ़िये ।