भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४४८ मृच्छकटिकम्

शकारः—( अधिरुह्यावलोक्य च शङ्कां नाटयित्वा त्वरितमवतीर्य विटं कण्ठेऽवलम्ब्य ) भावे ! भावे ! मलेशि मलेशि । पवहणाधिलूढा लक्खशी चोले वा पडिवशदि । जइ लक्खशी तदा उभे वि मूशे, अध चोले तदा उभे वि खज्जे । ( भाव ! भाव ! म्रियसे म्रियसे । प्रवहणाधिरूढा राक्षसी चौरो वा प्रतिवसति । यदि राक्षसी, तदा उभावपि मुषितौ, अथ चोरः तदा उभावपि खादितौ । )

विटः—न भेतव्यम् । कुतोऽत्र वृषभयाने राक्षस्याः सञ्चारः । मा नाम ते मध्याह्नार्क-ताप-च्छिन्न-दृष्टेः स्थावरकस्य सकञ्चुकां छायां दृष्ट्वा भ्रान्तिरुत्पन्ना ?

शकारः—पुत्तकाः ! थावलका ! चेडा । जीवेशि ? ( पुत्रक ! स्थावरक ! चेट ! जीवसि ? )

चेट—अध इं । ( अथ किम् )

शकारः—भावे ! पवहणाधिलूढा इत्थिआ पडिवशदि । ता अवलोएहि । ( भाव ! प्रवहणाधिरूढा स्त्री प्रतिवसति । तदवलोकय । )

विटः—कथं स्त्री ! ।

अवनतशिरसः प्रयाम शीघ्रं पथि वृषभा इव वर्षताडिताक्षाः ।
मम हि सदसि गौरवप्रियस्य कुलजनदर्शनकातरं हि चक्षुः ॥ १५ ॥


शकार—( चढ़ कर और देखकर शंका का अभिनय करके तुरन्त उतर कर विट को गले में पकड़कर ) भाव ! भाव ! तुम मर गये, मर गये । गाड़ी पर चढ़ी हुई राक्षसी अथवा चोर रहता है । यदि राक्षसी है तब तो हम दोनों चुरा लिये गये, और यदि चोर है तो दोनों खा लिये गये ।

विट—मत डरिये । इस बैलगाड़ी में राक्षसी कहाँ से आ सकती है । दोपहर में सूर्य की धूप से चकाचौंध भरी दृष्टि वाले तुम्हें स्थावरक की कुर्तायुक्त परछाईं देख कर भ्रान्ति पैदा हो गई है ।

शकार—बेटा, स्थावरक, चेट ! जीवित हो ।

चेट—और क्या ?

शकार—भाव ! गाड़ी पर चढ़ी हुई स्त्री बैठी है । अतः देखो ।

अन्वयः—पथि, वर्षताडिताक्षाः, वृषभाः, इव, अवनतशिरसः, शीघ्रम्, प्रयामः, हि, सदसि, गौरवप्रियस्य, मम, चक्षुः, कुलजनदर्शनकातरम्, हि ॥ १५ ॥

शब्दार्थ—पथि=रास्ते में, वर्षताडिताक्षाः=वर्षा, जलधारा से प्रताड़ित नेत्रों वाले, वृषभाः=बैलों, इव=के समान, अवनतशिरसः=झुके हुये शिर वाले ( हम लोग ), शीघ्रम्=जल्दी ही, प्रयामः=भाग चलें, हि=क्योंकि, सदसि=सभा में,