भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 537

अष्टमोऽङ्कः ४४३

वसन्तसेना—(सविस्मयमात्मगतम्) कहं मम णअणाणं आयासअरो ज्जेव राजस्सालो। ता संसइदम्हि मन्दभाआ। एसो दाणि मम मन्दभाइणोए ऊसरक्खेत्तपाडिदो विअ वीअमुट्ठो णिफ्फलो इध आगमगो संवुत्तो। ता किं एत्थ करइस्सम्? (कथं मम नयनयोरायासकर एव राजश्यालः। तत् संशयिताऽस्मि मन्दभाग्या। एतदिदानीं मन्दभाग्याया ऊषरक्षेत्रपतित इव बीजमुष्टिः निष्फलमिहागमनं संवृत्तम्। तत् किमत्र करिष्यामि?)

**शकारः—**कादले क्खू एशे बुड्ढचेड़े पवहणं णावलोएदि। भावे! आलोएहि पवहणं। (कातरः खल्वेषः वृद्धचेटो प्रवहणं नावलोकयति। भाव! आलोकय प्रवहणम्।)


समाज में, गौरवप्रियस्य=प्रतिष्ठा को चाहने वाले, मम=[विट की], चक्षुः= आंख, कुलजनदर्शनकातरम्=कुलीन स्त्री को देखने में डरने वाली है, हि=यह निश्चित है ।। १५ ।।

अर्थ—क्या स्त्री है?

[यदि स्त्री है तो हम लोग] मार्ग में वर्षा की जलधारा से ताड़ित आँखों वाले बैलों की तरह झुके हुये शिर वाले शीघ्र ही भाग चलें। क्योंकि सभा= समाज में प्रतिष्ठा चाहने वाले मेरे नेत्र कुलीन स्त्रियों के दर्शन में डरने वाले हैं ।। १५ ।।

टीका—प्रवहणे यदि नाम स्त्री तदाऽवाभ्यां किं करणीयमित्यत्राह विटः—अवनतेति। यदि स्त्री अस्ति तदा, पथि=मार्गे, गमनकाले इति भावः, वर्षताडिताक्षाः = वर्षाजलधाराप्रताडितनेत्राः, वृषभाः = बलीवर्दाः, इव=यथा, अवनतम्=नम्रीकृतम् शिरः=मूर्धा यैस्ते, वयम्, शीघ्रम्=तत्कालमेव, प्रयामः=पलायामहे, हि=यतः, सदसि=सभायाम् समाजे वा, गौरवम्=प्रतिष्ठा, प्रियम् यस्य तस्य, मम= विटस्य, चक्षुः=नेत्रम्, कुलजनानाम्=कुलीनस्त्रीणाम्, दर्शने = अवलोकने, कातरम्= भीरु, हि=निश्चयेन। एवञ्च कातरोऽहं न स्त्रीं द्रक्ष्यामीति तद्भावः। अत्रार्थान्तरन्यासोऽलंकारः, पुष्पिताग्रा वृत्तम् ।। १५ ।।

शब्दार्थ—सविस्मयम्=आश्चर्यपूर्वक, आयासकरः=कष्ट देने वाला, संशयिता= सन्देह में पड़ी हुई, ऊषर-क्षेत्रपतितः=ऊषर खेत में गिरे हुये, बीजमुष्टिः= बीजों की मुट्ठी, कातरः=डरपोक, उड्डीयन्ते=उड़ रहे हैं।

अर्थवसन्तसेना—(आश्चर्यसहित अपने में) क्या मेरी आँखों को खटकने वाला राजश्यालक ही है। इस कारण अभागिन मैं सन्देह में पड़ गई हूँ। इसलिये ऊषर क्षेत्र में गिराये गये बीजों की मुट्ठी के समान मेरा यहाँ आना, इस समय, व्यर्थ हो गया। अतः अब क्या करना चाहिये।

शकार—डरपोक यह बूढ़ा चेट गाड़ी नहीं देख रहा है। भाव! गाड़ी देखो।

२९ मृ०