मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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विटः--को दोषः । भवत्वेवं तावत् ।
शकारः--कधं शिआला उड्डेन्ति वाअशा वच्चेन्ति । ता जाव भावे अक्खीहिं खक्खीअदि, दन्तेहिं पेक्खिअदि, ताव हग्गे पलाइस्सं । ( कथं शृगाला उड्डयन्ते, वायसा व्रजन्ति । तद् यावत् भावः अक्षिभ्यां भक्ष्यते, दन्तैः प्रेक्ष्यते, तावदहं पलायिष्ये । )
विटः-- ( वसन्तसेनां दृष्ट्वा सविषादमात्मगतम् ) कथमये ! मृगी व्याघ्र-मनुसरति । भोः कष्टम् ।
शरच्चन्द्रप्रतीकाशं पुलिनान्तरशायिनम् । हंसी हंसं परित्यज्य वायसं समुपस्थिता ॥ १६ ॥
विट-- क्या बुराई है, ऐसा ही हो ।
शक.र-- क्यों सियार उड़ रहे हैं, कौवे भाग रहे हैं, अतः जब तक भाव को आँखों से खा नहीं लिया जाता, दांतों से देख लिया नहीं जाता, तब तक मैं भाग जाता हूँ ।
अन्वयः-- हंसी, शरच्चन्द्रप्रतीकाशम्, पुलिनान्तरशायिनम्, हंसम्, परित्यज्य, वायसम्, समुपस्थिता ॥ १६ ॥
शब्दार्थ-- हंसी=हंसी, शरच्चन्द्रप्रतीकाशम्=शरत्कालीन [ विमंल ] चन्द्रमा के समान, पुलिनान्तरशायिनम् = नदी के किनारे की जमीन पर लेटे हुये, हंसम्=हंस को, परित्यज्य = छोड़कर, वायसम्=कौवा के पास, समुपस्थिता = आ गयी है ॥ १६ ॥
अर्थ--विट-- ( वसन्तसेना को देखकर खेद-सहित, अपने में ) अरे, मृगी व्याघ्र के पीछे क्यों जा रही ? हाय कष्ट है—
हंसी शरत्कालीन चन्द्रमा के समान [ उज्ज्वल ], नदी के किनारे की जमीन पर लेटे हुये हंस को छोड़कर कौवा के पास आ गयी है ॥ १६ ॥
टीका--चारुदत्तं परित्यज्य वसन्तसेनायाः समागमने आश्चर्यं व्यनक्ति विटः-- शरदिति । हंसी=मराली, शरदः=तन्नामकर्तुविशेषस्य निर्मलस्येति भावः, चन्द्रः=शशी, तस्य प्रतीकाशम्=तुल्यम्, पुलिनस्य=नदीसमीपदेशस्य, अन्तरे=अभ्यन्तरे, शायिनम्=विद्यमानम्, हंसम् = मरालम्, परित्यज्य = त्यक्त्वा, वायसम् = काकम्, समुपस्थिता = समुपागता । यशोराशिचारुदत्तं विहाय काकतुल्यं शकारमुपगमनं वसन्तसेनाया अनुचितमेवेति भावः । अत्राप्रस्तुतप्रशंसालंकारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ १६ ॥