भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४५२ मृच्छकटिकम्

वसन्तसेना--पवहणबिवज्जासेण आगदा सरणागदम्हि । ( प्रवहण-विपर्यसिनागता शरणागताऽस्मि । )

विटः--न भेतव्यं न भेतव्यम् । भवत्वेनं वञ्चयामि । ( शकारमुपगम्य ) काणेलीमातः ! सत्यं राक्षस्येवात्र प्रतिवसति ।

शकारः--भावे ! भावे ! जइ लक्खशी पड़िवशदि, ता कीश ण तुमं मूशेदि ? अध चोले, ता किं ण तुमं भक्खिदे ? ( भाव ! भाव ! यदि राक्षसी प्रतिवसति, तत् केन न त्वां मुष्णाति ? अथ चौरः तत् किं न त्वं भक्षितः ? )

विटः--किमनेन निरूपितेन । यदि पुनरुद्यानपरम्परया पद्भ्यामेव नगरीमुज्जयिनीं प्रविशावः, तदा को दोषः स्यात् ?

शकारः--एव्वं किदे किं भोदि ? ( एवं कृते किं भवति ? )

विटः--एवं कृते व्यायामः सेवितो धुर्याणाञ्च परिश्रमः परिहृतो भवति ।

शकारः--एवं भोदु । थावलआ ! चेडा । गेह पवहणं । अथवा चिट्ठ चिट्ठ, देवदाणं वम्हणाणं च अग्गदो चलणेण गच्छामि । णहि णहि,


शब्दार्थ--प्रवहण-विपर्यसिन=गाड़ी की अदला-बदली के कारण, काणेली माता है जिस की ऐसा अर्थात् काणेली का बेटा, उद्यानपरम्परया= एक बगीचे से दूसरे में, दूसरे से तीसरे में--इसी प्रकार से आगे तक, धुर्याणाम् = बैलों का, परिहृतः=बचत, ओषधीकर्तुम्=औषधि बनाना, दुष्करम्=अति कठिन, अभिसारयि-तुम्=अभिसार करने के लिये। रोषिता = नाराज करा दी गई थी, प्रसादयामि=प्रसन्न करता हूँ। विज्ञप्तिम्=निवेदन।

अर्थ--वसन्तसेना--गाड़ी की अदला बदली के कारण आ गई हूँ, शरण में आई हूँ।

विट - मत डरो, मत डरो। अच्छा, इसको धोखा देता हूँ। ( शकार के पास जाकर ) काणेली के बेटे ! इस गाड़ी में तो सचमुच राक्षसी बैठी है।

शकार--भाव ! भाव ! यदि राक्षसी बैठी है तो तुम्हें क्यों नहीं चुराती है ? अगर चोर है तो तुम्हें क्यों नहीं खा लिया ?

विट--इस विवाद से क्या लाभ ? यदि हम दोनों बगीचे-बगीचे होकर पैदल ही उज्जैन शहर में चलें तो क्या बुराई है ?

शकार--ऐसा करने से क्या लाभ होगा ?

विट--ऐसा करने पर व्यायाम कर लिया जायगा ? और बैलों का परिश्रम बच जायगा।

शकार--ऐसा ही हो। स्थावरक चेट ! गाड़ी ले जाओ। अथवा रुको, रुको, देवताओं और ब्राह्मणों के आगे पैदल ही चलता हूँ। नहीं, नहीं, गाड़ी पर चढ़कर