मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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भणितः, तत् कथमहमेवं बृहत्तरैः मल्लकप्रमाणैः कुलैर्जातोऽकार्यं करोमि ? एवमेतदङ्गीकारयितुं मया भणितम् ।)
विटः—किं कुलेनोपदिष्टेन शीलमेवात्र कारणम् ।
भवन्ति सुतरां स्फीताः सुक्षेत्रे कण्टकिद्रुमाः ॥ २६ ॥
मैंने कहा था, तो पुरवा (शकोरा) के समान बहुत बड़े कुल में पैदा होकर अनुचित काम करूँगा। यह तो मैंने इससे इसलिये कहा था कि यह (वसन्तसेना) मुझे स्वीकार कर ले।
टीका—उपायः=वसन्तसेनायाः हत्योपायः, शिरश्चालनसंज्ञा=शिरः चालयित्वा सावधानता, मम शिरसि आक्रम्येदं सूचितं विटेन यदस्योपस्थितौ वसन्तसेनायाः मारणमसम्भवमिति भावः । केचिदनुमतिप्रदानमित्यर्थं प्रतिपादयन्ति, यत्=वसन्तसेनाबधादिविषयकं यत्किमपि, मल्लकप्रमाणैः=चषकतुल्यैरित्यर्थः । महत्त्वख्यापनाय समुद्रप्रमाणैरिति वक्तव्ये मौर्ख्यात् मल्लकप्रमाणतया कुलमुपमिनोतीति प्रामाणिकाः । क्वचिद् 'गल्लकप्रमाणैः'=कुक्कुरोपमैरिति पाठः स्वकुलस्य कुक्कुरतुल्यतां प्रकटयति मौर्ख्यादिति तद्भावः । एतत्=पूर्वोक्तं भयादिजनकमित्यर्थः, अङ्गीकारयितुम्=मां स्वीकर्तुमिति भावः ।
विमर्शः— शिरश्चालनसंज्ञा-इस पद के अर्थ विवादग्रस्त हैं। कुछ लोग-शिर हिलाकर अनुमति देना – अर्थ करते हैं। दूसरे लोग—शिर हिलाकर बुद्धि दे दी—यह अर्थ करते हैं।
वास्तव में यहाँ लाक्षणिक अर्थ लेना चाहिये। मेरा सिर हिलाकर=गर्दन पर हमला करके मुझे सावधान कर दिया है कि उस (विट) की उपस्थिति में वसन्तसेना का वध करना सम्भव नहीं है। यह अर्थ मानने में अग्रिम पंक्ति भी प्रमाण है—'तदेतं प्रेष्य वसन्तसेनां मारयिष्यामि ।'
मल्लकप्रमाणैः— अपने कुल की महत्ता के लिये समुद्रादि की उपमा न देकर मल्लक=मिट्टी के प्याला के साथ उपमा देना शकार की मूर्खता को प्रकट करता है। कहीं-कहीं 'गल्लकप्रमाणैः' ऐसा पाठ है। गल्लक का अर्थ कुक्कुर है। कुत्तों के समान कुल में पैदा होने वाला—यह भी ठीक ही है। यहाँ भी शकार की मूर्खता प्रकट होती है।
अन्वयः—कुलेन, उपदिष्टेन, किम्, अत्र, शीलम् एव, कारणम्, सुक्षेत्रे, कण्टकिद्रुमाः, सुतराम्, स्फीताः, भवन्ति ॥ २६ ॥
शब्दार्थ—कुलेन=कुल को, उपदिष्टेन = कहने से, किम्=क्या ? अत्र=इस [ अनुचित कार्यादि करने ] में, शीलम् = स्वभाव, एव = ही, कारणम् = कारण, हैं,